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कस्मा॑ अ॒द्य सुजा॑ताय रा॒तह॑व्याय॒ प्र य॑युः। ए॒ना यामे॑न म॒रुतः॑ ॥१२॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

kasmā adya sujātāya rātahavyāya pra yayuḥ | enā yāmena marutaḥ ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

कस्मै॑। अ॒द्य। सुऽजा॑ताय। रा॒तह॑व्याय। प्र। य॒युः॒। ए॒ना। यामे॑न। म॒रुतः॑ ॥१२॥

ऋग्वेद » मण्डल:5» सूक्त:53» मन्त्र:12 | अष्टक:4» अध्याय:3» वर्ग:13» मन्त्र:2 | मण्डल:5» अनुवाक:4» मन्त्र:12


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स्वामी दयानन्द सरस्वती

फिर मनुष्यों को क्या करना चाहिये, इस विषय को कहते हैं ॥

पदार्थान्वयभाषाः - जो (मरुतः) मनुष्य (अद्य) आज (एना) इस (यामेन) विरक्त हुए से (कस्मै) किस (सुजाताय) उत्तम विद्याओं में प्रसिद्ध (रातहव्याय) दिया दातव्य जिसने उसके लिये (प्र, ययुः) प्राप्त होते हैं, वे विद्या के देनेवाले होकर प्रशंसित होते हैं ॥१२॥
भावार्थभाषाः - विद्या आदि उत्तम गुणों के दान के विना विद्वानों की प्रशंसा नहीं होती है ॥१२॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

आनन्दमय-उत्तम प्रादुर्भाववाला-त्यागमय जीवन

पदार्थान्वयभाषाः - [१] गतमन्त्र में कहा था कि हम प्राणसाधना के द्वारा जहाँ बल को प्राप्त करते हैं, वहाँ हमारा जीवन व्रतमय होता है और हमारे इन्द्रियादि के गण उत्तम बनते हैं। (एना) = इस 'बल, व्रत व उत्तम इन्द्रिय आदि के गणोंवाले' (यामेन) = मार्ग से (मरुतः प्राण) = प्राणसाधना करनेवाले पुरुष, (अद्य) = आज (कस्मै) = उस आनन्दस्वरूप, (सुजाताय) = उत्तम प्रादुर्भाववाले, (रातहव्याय) = सब हव्य पदार्थों को देनेवाले प्रभु के लिये (प्रययुः) = प्रकर्षेण गतिवाले होते हैं। [२] प्राणसाधना से अन्ततः 'विवेकख्याति' प्राप्त होती है, यह विवेकख्याति प्रभु-दर्शन का साधन बनती है।
भावार्थभाषाः - भावार्थ - प्राण हमें आनन्दस्वरूप, उत्तम प्रादुर्भाववाले, हव्य पदार्थों को प्राप्त करानेवाले प्रभु की ओर ले चलते हैं। हमारे जीवनों को भी ये आनन्दमय, उत्तम प्रादुर्भाववाला व त्यागमय व यज्ञशील बनाते हैं ।
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स्वामी दयानन्द सरस्वती

पुनर्मनुष्यैः किं कर्त्तव्यमित्याह ॥

अन्वय:

ये मरुतोऽद्यैना यामेन कस्मै सुजाताय रातहव्याय प्र ययुस्ते विद्यादातारो भूत्वा प्रशंसिता जायन्ते ॥१२॥

पदार्थान्वयभाषाः - (कस्मै) (अद्य) (सुजाताय) सुष्ठुविद्यासु प्रसिद्धाय (रातहव्याय) दत्तदातव्याय (प्र, ययुः) प्राप्नुवन्ति (एना) एनेन (यामेन) उपरतेन (मरुतः) मनुष्याः ॥१२॥
भावार्थभाषाः - विद्यादिशुभगुणदानेन विना विदुषां प्रशंसा नैव जायते ॥१२॥
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - For which cultured, creative and generous personality, for which producing and providing community of yajnic gifts, do the Maruts, dynamic forces of life, move forward today by this chariot with controlled motion and direction?
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आचार्य धर्मदेव विद्या मार्तण्ड

What should man do is told.

अन्वय:

To whom the persons renowned on account of profound knowledge and givers of desirable things have gone with these thoughtful persons in peaceful mind? Being the givers of knowledge, such persons become admirable everywhere.

भावार्थभाषाः - Without imparting knowledge and other good virtues, the scholars are not admired anywhere.
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माता सविता जोशी

(यह अनुवाद स्वामी दयानन्द सरस्वती जी के आधार पर किया गया है।)
भावार्थभाषाः - विद्या इत्यादी उत्तम गुण दान केल्याशिवाय विद्वानांची प्रशंसा होत नाही. ॥ १२ ॥