को वे॑द॒ जान॑मेषां॒ को वा॑ पु॒रा सु॒म्नेष्वा॑स म॒रुता॑म्। यद्यु॑यु॒ज्रे कि॑ला॒स्यः॑ ॥१॥
ko veda jānam eṣāṁ ko vā purā sumneṣv āsa marutām | yad yuyujre kilāsyaḥ ||
कः। वे॒द॒। जान॑म्। ए॒षा॒म्। कः। वा॒। पु॒रा। सु॒म्नेषु॑। आ॒स॒। म॒रुता॑म्। यत्। यु॒यु॒ज्रे। कि॒ला॒स्यः॑ ॥१॥
स्वामी दयानन्द सरस्वती
अब सोलह ऋचावाले त्रेपनवें सूक्त का आरम्भ है, उसके प्रथम मन्त्र में अब मनुष्य क्या जानें, इस विषय को कहते हैं ॥
हरिशरण सिद्धान्तालंकार
प्राणायामैर्दहेद् दोषान्
स्वामी दयानन्द सरस्वती
अथ मनुष्याः किं जानीयुरित्याह ॥
हे मनुष्या विद्वांसो वा ! यद्युयुज्रे तदेषां मरुतां जानं किलास्यः को वेद को वा सुम्नेषु पुरास ॥१॥
डॉ. तुलसी राम
आचार्य धर्मदेव विद्या मार्तण्ड
Men's duties are told.
O ordinary or highly learned men ! who knows the origin or manifestation of these men winds who are used for various purposes? Who is such a man whose mouth (or tongue) is full of certainty about it? Who is it that has been dwelling in happiness before?
माता सविता जोशी
(यह अनुवाद स्वामी दयानन्द सरस्वती जी के आधार पर किया गया है।)या सूक्तात प्रश्न, उत्तर व विद्वानांच्या गुणांचे वर्णन असल्यामुळे या सूक्ताच्या अर्थाबरोबर पूर्वसूक्ताच्या अर्थाची संगती जाणावी.
