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को वे॑द॒ जान॑मेषां॒ को वा॑ पु॒रा सु॒म्नेष्वा॑स म॒रुता॑म्। यद्यु॑यु॒ज्रे कि॑ला॒स्यः॑ ॥१॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

ko veda jānam eṣāṁ ko vā purā sumneṣv āsa marutām | yad yuyujre kilāsyaḥ ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

कः। वे॒द॒। जान॑म्। ए॒षा॒म्। कः। वा॒। पु॒रा। सु॒म्नेषु॑। आ॒स॒। म॒रुता॑म्। यत्। यु॒यु॒ज्रे। कि॒ला॒स्यः॑ ॥१॥

ऋग्वेद » मण्डल:5» सूक्त:53» मन्त्र:1 | अष्टक:4» अध्याय:3» वर्ग:11» मन्त्र:1 | मण्डल:5» अनुवाक:4» मन्त्र:1


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स्वामी दयानन्द सरस्वती

अब सोलह ऋचावाले त्रेपनवें सूक्त का आरम्भ है, उसके प्रथम मन्त्र में अब मनुष्य क्या जानें, इस विषय को कहते हैं ॥

पदार्थान्वयभाषाः - हे मनुष्यो वा विद्वानो ! (यत्) जो (युयुज्रे) युक्त होता है, वह (एषाम्) इन (मरुताम्) मनुष्यों वा पवनों के (जानम्) प्रादुर्भाव को (किलास्यः) निश्चित सुख जिसका वह (कः) कौन (वेद) जानता है (कः, वा) अथवा कौन (सुम्नेषु) सुखों में (पुरा) प्रथम (आस) स्थित है ॥१॥
भावार्थभाषाः - मनुष्य और वायु आदि पदार्थों के लक्षण और लक्ष्यों को विद्वान् जन ही जानने को समर्थ हो सकते हैं, अन्य नहीं ॥१॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

प्राणायामैर्दहेद् दोषान्

पदार्थान्वयभाषाः - [१] (कः) = कोई विरला पुरुष ही (एषां जानं वेद) = इन प्राणों के प्रादुर्भाव व विकास को जानता है। अर्थात् विरला व्यक्ति ही प्राणसाधना में प्रवृत्त होते हैं और प्राणशक्ति का विकास करते हैं । (वा) = अथवा (कः) = कोई ही (पुरा) = सब से प्रथम (मरुताम्) = इन प्राणों के (सुम्नेषु) = स्तवनों में (आस) = स्थित होता है। अर्थात् विरला व्यक्ति ही प्राणसाधना को सर्वप्राथमिकता देते हैं । सामान्यतः इस प्राणसाधना में प्रवृत्त ही नहीं होते और यदि कोई प्रवृत्त होते भी हैं, तो वे इस प्राणसाधना को सर्वमहत्त्वपूर्ण कार्य नहीं समझते। [२] (यद्) = जब कोई विरला पुरुष इस प्राणसाधना को महत्त्व देता है, तो (किलास्यः) = ये इन्द्रियरूप वडवायें [घोड़ियाँ] (युयुज्रे) = इस शरीर-रथ में जोती जाती हैं, कर्मेन्द्रियाँ यज्ञादि उत्तम कर्मों में प्रवृत्त रहती हैं और ज्ञानेन्द्रियाँ सदा ज्ञानप्राप्ति में लगी रहती हैं।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- प्राणसाधना में विरले ही मनुष्य प्रवृत्त होते हैं। जब प्रवृत्त होते हैं, तो उनके इन्द्रियाश्व यज्ञों व ज्ञान प्राप्ति में प्रवृत्त रहते हैं। एवं प्राणायाम से इन्द्रियदोषों का दहन हो जाता है।
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स्वामी दयानन्द सरस्वती

अथ मनुष्याः किं जानीयुरित्याह ॥

अन्वय:

हे मनुष्या विद्वांसो वा ! यद्युयुज्रे तदेषां मरुतां जानं किलास्यः को वेद को वा सुम्नेषु पुरास ॥१॥

पदार्थान्वयभाषाः - (कः) (वेद) जानाति (जानम्) प्रादुर्भावम् (एषाम्) मनुष्याणां वायूनां वा (कः) (वा) (पुरा) पुरस्तात् (सुम्नेषु) (आस) आस्ते (मरुताम्) मनुष्याणां वायूनां वा (यत्) (युयुज्रे) युञ्जते (किलास्यः) निश्चितमास्यं यस्य सः ॥१॥
भावार्थभाषाः - मनुष्यवाय्वादिपदार्थलक्षणलक्ष्याणि विद्वांस एव ज्ञातुं शक्नुवन्ति नेतरे ॥१॥
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - Who knows the origin of these Maruts? Who was present in the peace and pleasure of the Maruts? Whoever concentrates the mind, meditates on their presence, and joins them, and then has the clear and specific language to describe them, knows these stormy powers.
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आचार्य धर्मदेव विद्या मार्तण्ड

Men's duties are told.

अन्वय:

O ordinary or highly learned men ! who knows the origin or manifestation of these men winds who are used for various purposes? Who is such a man whose mouth (or tongue) is full of certainty about it? Who is it that has been dwelling in happiness before?

भावार्थभाषाः - It is only great scholars who can with certainty know the definition and attributes of man, wind and other objects.
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माता सविता जोशी

(यह अनुवाद स्वामी दयानन्द सरस्वती जी के आधार पर किया गया है।)

या सूक्तात प्रश्न, उत्तर व विद्वानांच्या गुणांचे वर्णन असल्यामुळे या सूक्ताच्या अर्थाबरोबर पूर्वसूक्ताच्या अर्थाची संगती जाणावी.

भावार्थभाषाः - माणसे व वायू इत्यादी पदार्थांचे लक्षण व लक्ष्य यांना विद्वान लोकच जाणण्यास समर्थ असतात, इतर नव्हे! ॥ १ ॥