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य ऋ॒ष्वा ऋ॒ष्टिवि॑द्युतः क॒वयः॒ सन्ति॑ वे॒धसः॑। तमृ॑षे॒ मारु॑तं ग॒णं न॑म॒स्या र॒मया॑ गि॒रा ॥१३॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

ya ṛṣvā ṛṣṭividyutaḥ kavayaḥ santi vedhasaḥ | tam ṛṣe mārutaṁ gaṇaṁ namasyā ramayā girā ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

ये। ऋ॒ष्वाः। ऋ॒ष्टिऽवि॑द्युतः। क॒वयः॑। सन्ति॑। वे॒धसः॑। तम्। ऋ॒षे॒। मारु॑तम्। ग॒णम्। न॒म॒स्य। र॒मय॑। गि॒रा ॥१३॥

ऋग्वेद » मण्डल:5» सूक्त:52» मन्त्र:13 | अष्टक:4» अध्याय:3» वर्ग:10» मन्त्र:3 | मण्डल:5» अनुवाक:4» मन्त्र:13


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स्वामी दयानन्द सरस्वती

मनुष्यों को किसका सङ्ग करना चाहिये, इस विषय को कहते हैं ॥

पदार्थान्वयभाषाः - हे (ऋषे) वेदार्थ के जाननेवाले ! (ये) जो (ऋष्टिविद्युतः) ऋष्टिविद्युत् अर्थात् बिजुली में विज्ञान जिनका वे (कवयः) सम्पूर्ण शास्त्रों में निपुण (ऋष्वाः) बड़े महाशय (वेधसः) बुद्धिमान् जन (सन्ति) हैं उनका (गिरा) उत्तम प्रकार शिक्षित सत्य कोमल वाणी से (नमस्या) सत्कार करिये और इससे (तम्) उस (मारुतम्) विद्वान् मनुष्यों के (गणम्) समूह को (रमया) क्रीड़ा से आनन्दित करिये ॥१३॥
भावार्थभाषाः - जो महाशय यथार्थवक्त जनों की सेवा और सत्कार कर उत्तम शिक्षा को प्राप्त होकर सत्य और असत्य के विवेक के लिये उपदेश करके सब मनुष्यों को आनन्दित करते हैं, वे सब लोगों से सत्कार पाने योग्य होते हैं ॥१३॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

प्राणोपासना

पदार्थान्वयभाषाः - [१] (ये) = जो मरुत [प्राण] (ऋष्वा:) = दर्शनीय है, ॠष्टि (विद्युतः) = इन्द्रिय, 'मन व बुद्धि' रूप आयुधों से द्योतमान हैं, (कवयः) = क्रान्तदर्शी हैं तथा (वेधसः) = शरीर के अंग-प्रत्यंगों का सुन्दर निर्माण करनेवाले हैं, हे (ऋषे तत्त्वद्रष्टः) = पुरुष! (तं मारुते गणम्) = उस प्राणों के गण को (गिरा) = ज्ञान की वाणियों के द्वारा (रमया) = शरीर में क्रीडा करा और (नमस्य) = पूजित कर । [२] प्राणों की शक्ति अद्भुत है, वे अपनी शक्ति के कारण दर्शनीय हैं। ये 'इन्द्रिय, मन, बुद्धि' रूप आयुधों को विद्योतित करते हैं। बुद्धि को तीव्र बनाते हैं। सब अंगों की शक्ति के विधाता हैं। ज्ञान प्रधान जीवन बिताने से प्राणशक्ति का पोषण होता है। यही प्राणों का पूजन है। भोग-विलास का जीवन बिताना ही प्राणों का निरादर है । =
भावार्थभाषाः - भावार्थ- प्राणसाधना से जीवन दर्शनीय सूक्ष्म बुद्धिवाला व पुष्ट अंगोंवाला बनता है। हम ज्ञान प्रधान जीवन बिताते हुए प्राणों का पोषण व पूजन करें।
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स्वामी दयानन्द सरस्वती

मनुष्यैः केषां सङ्गः कर्त्तव्य इत्याह ॥

अन्वय:

हे ऋषे ! य ऋष्टिविद्युतः कवय ऋष्वा वेधसः सन्ति तान् गिरा नमस्याऽनेन तं मारुतं गणं रमया ॥१३॥

पदार्थान्वयभाषाः - (ये) (ऋष्वाः) महान्तो महाशयाः (ऋष्टिविद्युतः) विद्युति ऋष्टिर्विज्ञानं येषान्ते (कवयः) सकलशास्त्रेषु निपुणाः (सन्ति) (वेधसः) मेधाविनः (तम्) (ऋषे) वेदार्थवित् (मारुतम्) विदुषां मनुष्याणामिमम् (गणम्) समूहम् (नमस्या) सत्कुरु। अत्र संहितायामिति दीर्घः। (रमया) क्रीडयाऽऽनन्दय। अत्रापि संहितायामिति दीर्घः। (गिरा) सुशिक्षितया सत्यया कोमलया वाचा ॥१३॥
भावार्थभाषाः - ये महाशया आप्तान् सेवित्वा सत्कृत्य सुशिक्षां प्राप्य सत्यासत्यविवेकायोपदेशं कृत्वा सर्वान् मनुष्यानानन्दयन्ति ते सर्वैः सत्कर्त्तव्या भवन्ति ॥१३॥
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - Those who are great and strong, formidable scholars of science, of heat, light and electric energy, poetic visionaries, writers and singers, and sages of the sacred love: for that class of dynamic leaders and path finders, O Rshi, seer, sage and scholar, offer reverence and homage and, with the celebrant’s words of praise and appreciation, give them the feel of the joy and holiness of their vocation.
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आचार्य धर्मदेव विद्या मार्तण्ड

Whose association should men keep is told.

अन्वय:

O Rishi ! knower of the meaning of the mantras ! you honour the host of the enlightened men who are knowers of the science of electricity, well-versed in all shastras and great (sublime) geniuses with well-trained, true and soft speech. Make them happy with your refined speech.

टिप्पणी: The epithets used for the Maruts like Rishwah, Kavayah, Vedhasah etc. clearly denote that they are great and wise men and not 'storm sods' as Prof. Maxmuller and some other Western translators have erroneously maintained. Even the faulty translation of Prof. Wilson and Griffith corroborates this. कवयः has been translated by Prof. Wilson as 'wise' and by: Griffith as ‘Sages'. Can these epithets be used for 'storm gods?
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माता सविता जोशी

(यह अनुवाद स्वामी दयानन्द सरस्वती जी के आधार पर किया गया है।)
भावार्थभाषाः - जे लोक आप्त विद्वानांची सेवा व सत्कार करून उत्तम शिक्षण घेऊन सत्यासत्याच्या विवेकाचा उपदेश करून सर्व माणसांना आनंदित करतात. त्यांचा सर्व लोकांनी सत्कार करावा, अशी त्यांची योग्यता असते. ॥ १३ ॥