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वात॑स्य॒ पत्म॑न्नीळि॒ता दैव्या॒ होता॑रा॒ मनु॑षः। इ॒मं नो॑ य॒ज्ञमा ग॑तम् ॥७॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

vātasya patmann īḻitā daivyā hotārā manuṣaḥ | imaṁ no yajñam ā gatam ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

वात॑स्य। पत्म॑न्। ई॒ळि॒ता। दैव्या॑। होता॑रा। मनु॑षः। इ॒मम्। नः॒। य॒ज्ञम्। आ। ग॒त॒म् ॥७॥

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ऋग्वेद » मण्डल:5» सूक्त:5» मन्त्र:7 | अष्टक:3» अध्याय:8» वर्ग:21» मन्त्र:2 | मण्डल:5» अनुवाक:1» मन्त्र:7


स्वामी दयानन्द सरस्वती

फिर उसी विषय को कहते हैं ॥

पदार्थान्वयभाषाः - हे (ईळिता) प्रशंसित (दैव्या) श्रेष्ठ गुणों में उत्पन्न (होतारा) दाता जनो ! आप दोनों (वातस्य) वायु के (पत्मन्) गिरते हैं जिसमें उस मार्ग में (नः) हम लोगों के (इमम्) इस (यज्ञम्) मिलने योग्य व्यवहार को (मनुषः) और मनुष्यों को (आ, गतम्) प्राप्त होवें ॥७॥
भावार्थभाषाः - हे स्त्री-पुरुषो ! आप दोनों धर्म्मसम्बन्धी कर्म्म के आचरण से प्रशंसित होकर इस गृहाश्रमव्यवहार को सिद्ध करो ॥७॥

हरिशरण सिद्धान्तालंकार

जीवन यज्ञ के दैव्य होता

पदार्थान्वयभाषाः - [१] शरीर में जो जीवनयज्ञ चलता है उसके 'दो कान, दो आँखें, दो नासिका-छिद्र व मुख' ये सात होता हैं। इस जीवन यज्ञ के रक्षक प्राण व अपान हैं। उन्हें यहाँ 'दैव्य होता' कहा है। ये दोनों उस महान् देव प्रभु से शरीर में यज्ञ ही रक्षा के लिये स्थापित हुए हैं। ये दोनों (नः) = हमारे (इमम्) = इस (यज्ञम्) = जीवन यज्ञ को (आगतम्) = प्राप्त हों । इन्होंने ही तो हमारे इस जीवन यज्ञ का रक्षण करना है 'तत्र जागृतः आस्वप्नजौ सत्रसदौ च देवौ'-वे देव यज्ञ में आसीन होकर सदा जागते हैं। [२] ये दोनों (वातस्य पत्मन्) = वायु के पतन-स्थान अन्तरिक्ष में, हृदयान्तरिक्ष में (ईडिता) = स्तुत होते हैं। वायु अन्तरिक्ष की देवता है, प्राणापान हृदयान्तरिक्ष की। ये (मनुषः) = विचारशील पुरुष के (दैव्या होतारा) = प्रभु से दिये गये होता हैं, अथवा विचारशील पुरुष को प्रभु की ओर ले जानेवाले होता हैं।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- बाहर जो वायु का स्थान है, वही शरीर में प्राणापान का। वे मनुष्य को प्रभु की ओर ले जानेवाले होते हैं, जीवन यज्ञ को सफल करते हैं ।

स्वामी दयानन्द सरस्वती

पुनस्तमेव विषयमाह ॥

अन्वय:

हे ईळिता दैव्या होतारा ! युवां वातस्य पत्मन्न इमं यज्ञं मनुषश्चाऽऽगतम् ॥७॥

पदार्थान्वयभाषाः - (वातस्य) वायोः (पत्मन्) पतन्ति यस्मिन् मार्गे तस्मिन् (ईळिता) प्रशंसितौ (दैव्या) देवेषु दिव्यगुणेषु भवौ (होतारा) दातारौ (मनुषः) मनुष्यान् (इमम्) (नः) अस्माकम् (यज्ञम्) सङ्गन्तव्यं व्यवहारम् (आ) (गतम्) आगच्छतम् ॥७॥
भावार्थभाषाः - हे स्त्रीपुरुषौ ! युवां धर्म्यकर्माचरणेन प्रशंसितौ भूत्वेतं गृहाश्रमव्यवहारं साध्नुतम् ॥७॥

डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - Divine performers of yajna, night and the dawn of day, blessed benefactors of humanity, celebrated in songs of praise and prayer, come by flight of the winds to grace this yajna of ours.

आचार्य धर्मदेव विद्या मार्तण्ड

The rulers' duties are highlighted.

अन्वय:

O divine donors! admired by all, come to this our Yajna (unifying dealings) and to good men, like a man goes to a path where the wind is blowing, i.e. is easy track.

भावार्थभाषाः - O men and women! being admired by all because of the observance of righteous conduct, let us accomplish our dealings or discharge the duties of the household life (grihasthashrama).

माता सविता जोशी

(यह अनुवाद स्वामी दयानन्द सरस्वती जी के आधार पर किया गया है।)
भावार्थभाषाः - हे स्त्री-पुरुषांनो ! तुम्ही प्रशंसित धर्मकर्म करून गृहस्थाश्रमाचा व्यवहार करा ॥ ७ ॥