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सु॒प्रती॑के वयो॒वृधा॑ य॒ह्वी ऋ॒तस्य॑ मा॒तरा॑। दो॒षामु॒षास॑मीमहे ॥६॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

supratīke vayovṛdhā yahvī ṛtasya mātarā | doṣām uṣāsam īmahe ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

सु॒प्रती॑के॒ इति॑ सु॒ऽप्रती॑के। व॒यः॒ऽवृधा॑। य॒ह्वी इति॑। ऋ॒तस्य॑। मा॒तरा॑। दो॒षाम्। उ॒षस॑म्। ई॒म॒हे॒ ॥६॥

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ऋग्वेद » मण्डल:5» सूक्त:5» मन्त्र:6 | अष्टक:3» अध्याय:8» वर्ग:21» मन्त्र:1 | मण्डल:5» अनुवाक:1» मन्त्र:6


स्वामी दयानन्द सरस्वती

फिर उसी विषय को कहते हैं ॥

पदार्थान्वयभाषाः - हे मनुष्यो ! जैसे हम लोग (सुप्रतीके) उत्तम विश्वास करने (वयोवृधा) सुन्दर जीवन को बढ़ाने और (यह्वी) बड़े (ऋतस्य) सत्य के (मातरा) आदर देनेवाले (दोषाम्) रात्रि और (उषासम्) दिन की (ईमहे) याचना करते हैं, वैसे इन की आप लोग भी याचना करो ॥६॥
भावार्थभाषाः - जैसे रात्रि और दिन एक साथ ही वर्त्तमान हैं, वैसे ही जिन्होंने विवाह किया, ऐसे स्त्री पुरुष वर्त्ताव करें ॥६॥

हरिशरण सिद्धान्तालंकार

जीवन को बनानेवाले 'दिन-रात'

पदार्थान्वयभाषाः - [१] हम जीवन के निर्माण करनेवाले (दोषाम्) = रात्रि को व (उषासम्) = उषा [दिन] को (ईमहे) = स्तुत करते हैं। दिन व रात का ठीक उपयोग ही इनका स्तवन है। दिन के एक-एक क्षण को क्रियामय बनाते हुए हम इसे सचमुच 'उषस्' [दोष दहन करनेवाला] बनाते हैं तथा रात्रि को आराम करते हुए इसे रमयित्री करते हैं । [२] ये दिन-रात (सुप्रतीके) = उत्तम अंगोंवाले हैं। यदि दिन हमारा खूब क्रियाशील बीतता है और रात्रि हमारे लिये रमयित्री होती है तो सब अंग-प्रत्यंग स्वास्थ्य के सौन्दर्य से दीप्त प्रतीत होते हैं। (वयोवृधा) = ये दिन-रात हमारे आयुष्य के वर्धक हैं। (यह्वी) = हमारे लिये महत्त्वपूर्ण हैं [महत्यौ] । हमारे जीवनों में (ऋतस्य) = सब ठीक चीजों का मातरा निर्माण करनेवाले हैं।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- हमारे दिन-रात क्रमशः निरन्तर क्रिया व आराम में बीतते हुए हमारे जीवन को 'सुरूप, दीर्घ व यज्ञिय' बनानेवाले हों।

स्वामी दयानन्द सरस्वती

पुनस्तमेव विषयमाह ॥

अन्वय:

हे मनुष्या ! यथा वयं सुप्रतीके वयोवृधा यह्वी ऋतस्य मातरा दोषामुषासमीमहे तथैते यूयमपि याचध्वम् ॥६॥

पदार्थान्वयभाषाः - (सुप्रतीके) सुष्ठु प्रतीतिकरे (वयोवृधा) ये वयः कमनीयं जीवनं वर्धयतः (यह्वी) महत्यौ (ऋतस्य) सत्यस्य (मातरा) मान्यप्रदे (दोषाम्) रात्रीम् (उषासम्) दिनम्। अत्रान्येषामपीति दीर्घः। (ईमहे) याचामहे ॥६॥
भावार्थभाषाः - यथा रात्रिदिने सहैव वर्त्तेते तथैव कृतविवाहौ स्त्रीपुरुषौ वर्त्तेयाताम् ॥६॥

डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - We arise, welcome and honour the night and the dawn of day, both gracious and blissful of form, energisers of life, mighty strong, observers of nature’s law and makers of yajna.

आचार्य धर्मदेव विद्या मार्तण्ड

The duties of a ruler are further continued.

अन्वय:

O men ! by praying to God at the time of the night and dawn, one gets knowledge well. You promote desirable good life, and are great givers of respect of truth. So you should also beg for your welfare to God at those two times.

भावार्थभाषाः - As day and night live together, so married couple should live mutually helping.

माता सविता जोशी

(यह अनुवाद स्वामी दयानन्द सरस्वती जी के आधार पर किया गया है।)
भावार्थभाषाः - जसे रात्र व दिवस बरोबरच असतात तसाच व्यवहार विवाहित स्त्री- पुरुषांनी करावा ॥ ६ ॥