वांछित मन्त्र चुनें
457 बार पढ़ा गया

ई॒ळि॒तो अ॑ग्न॒ आ व॒हेन्द्रं॑ चि॒त्रमि॒ह प्रि॒यम्। सु॒खै रथे॑भिरू॒तये॑ ॥३॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

īḻito agna ā vahendraṁ citram iha priyam | sukhai rathebhir ūtaye ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

ई॒ळि॒तः। अ॒ग्ने॒। आ। व॒ह॒। इन्द्र॑म्। चि॒त्रम्। इ॒ह। प्रि॒यम्। सु॒ऽखैः। रथे॑भिः। ऊ॒तये॑ ॥३॥

457 बार पढ़ा गया
ऋग्वेद » मण्डल:5» सूक्त:5» मन्त्र:3 | अष्टक:3» अध्याय:8» वर्ग:20» मन्त्र:3 | मण्डल:5» अनुवाक:1» मन्त्र:3


स्वामी दयानन्द सरस्वती

अब राजविषय को कहते हैं ॥

पदार्थान्वयभाषाः - हे (अग्ने) आत्मप्रकाशस्वरूप (ईळितः) प्रशंसा किये गये आप (इह) इस संसार में (सुखैः) सुखकारक (रथेभिः) वाहनों से (ऊतये) रक्षण आदि के लिये (चित्रम्) अद्भुत (प्रियम्) मनोहर (इन्द्रम्) अत्यन्त ऐश्वर्य्य को (आ, वह) सब प्रकार से प्राप्त कीजिये ॥३॥
भावार्थभाषाः - हे राजन् ! आप बड़े ऐश्वर्य्य को प्राप्त होके प्रजा के रक्षण के लिये सर्वत्र भ्रमण कीजिये ॥३॥

हरिशरण सिद्धान्तालंकार

'सुख' रथ

पदार्थान्वयभाषाः - [१] हे (अग्ने) = अग्रणी प्रभो ! (ईडितः) = स्तुति किये गये आप (इह) = इस जीवन में (इन्द्रम्) = इस जितेन्द्रिय पुरुष को (प्रियम्) = प्रीति के साधक (चित्रम्) = अद्भुत ज्ञान को [चित्-ज्ञाने] (आवह) = प्राप्त कराइये। [२] इस ज्ञान के द्वारा ही तो आप (सुखैः) = [सु-ख] उत्तम इन्द्रियोंवाले (रथेभिः) = शरीररथों से (ऊतये) = हमारे रक्षण के लिये होते हैं। प्रभु हमें ज्ञान प्राप्त कराते हैं, ज्ञान के द्वारा इन्द्रियाँ उत्तम बनती हैं। सब इन्द्रियों के उत्तम होने पर ही जीवन-यात्रा का सुख निर्भर करता है ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- प्रभु उपासक को ज्ञान प्राप्त कराते हैं, ज्ञान के द्वारा इन्द्रियाँ उत्तम होती हैं, इन्द्रियों के ठीक होने पर शरीर-रथ ठीक से चलता हुआ जीवन-यात्रा की पूर्ति का साधक होता है ।

स्वामी दयानन्द सरस्वती

अथ राजविषयमाह ॥

अन्वय:

हे अग्ने ! ईळितस्त्वमिह सुखै रथेभिरूतये चित्रं प्रियमिन्द्रमा वह ॥३॥

पदार्थान्वयभाषाः - (ईळितः) प्रशंसितः (अग्ने) प्रकाशात्मन् (आ) (वह) समन्तात् प्राप्नुहि (इन्द्रम्) परमैश्वर्यम् (चित्रम्) अद्भुतम् (इह) संसारे (प्रियम्) कमनीयम् (सुखैः) सुखकारकैः (रथेभिः) यानैः (ऊतये) रक्षणाद्याय ॥३॥
भावार्थभाषाः - राजँस्त्वं महैश्वर्य्यं प्राप्य प्रजारक्षणाय सर्वत्र भ्रम ॥३॥

डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - Served and celebrated in yajna, O light of life, Agni, hastening hither-ward by holy chariots for our protection and advancement, bring into the world the dearest wonderful wealth of honour and excellence with peace, comfort and freedom from fear.

आचार्य धर्मदेव विद्या मार्तण्ड

Here the duties of a king are mentioned.

अन्वय:

O illumined soul ! being admired by us, bring in this world vehicles which are wonderful and bestow happiness, and dear prosperity in order to protect us.

भावार्थभाषाः - O king ! having attained prosperity, you roam about everywhere for the protection of your subjects.

माता सविता जोशी

(यह अनुवाद स्वामी दयानन्द सरस्वती जी के आधार पर किया गया है।)
भावार्थभाषाः - हे राजा ! तू अत्यंत ऐश्वर्य प्राप्त करून प्रजेच्या रक्षणासाठी सर्वत्र भ्रमण कर. ॥ ३ ॥