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यत्र॒ वेत्थ॑ वनस्पते दे॒वानां॒ गुह्या॒ नामा॑नि। तत्र॑ ह॒व्यानि॑ गामय ॥१०॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

yatra vettha vanaspate devānāṁ guhyā nāmāni | tatra havyāni gāmaya ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

यत्र॑। वेत्थ॑। व॒न॒स्प॒ते॒। दे॒वाना॑म्। गुह्या॑। नामा॑नि। तत्र॑। ह॒व्यानि॑। ग॒म॒य॒ ॥१०॥

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ऋग्वेद » मण्डल:5» सूक्त:5» मन्त्र:10 | अष्टक:3» अध्याय:8» वर्ग:21» मन्त्र:5 | मण्डल:5» अनुवाक:1» मन्त्र:10


स्वामी दयानन्द सरस्वती

अब विद्याग्रहणविषय को कहते हैं ॥

पदार्थान्वयभाषाः - हे (वनस्पते) वन के पालन करनेवाले आप (यत्र) जिसमें (देवानाम्) विद्वानों के (गुह्या) गुप्त (नामानि) नाम (वेत्थ) जानते हैं (तत्र) वहाँ (हव्यानि) देने और लेने योग्य वस्तुओं को (गामय) पहुँचाइये ॥१०॥
भावार्थभाषाः - जो विद्वानों के हृदयों में स्थित और विद्या के प्रभाव से उत्पन्न हुए नामों को जानते हैं, वे बहुत सुख मनुष्यों को प्राप्त कराते हैं ॥१०॥

हरिशरण सिद्धान्तालंकार

'वनस्पति' प्रभु [ज्ञानरश्मियों के पति]

पदार्थान्वयभाषाः - [१] हे (वनस्पते) = ज्ञानरश्मियों के स्वामिन् प्रभो ! यत्र जहाँ आप (देवानाम्) = देववृत्तिवाले-पुरुषों के (गुह्या) = हृदयरूप गुहा में होनेवाली (नामानि) = नम्रता की भावनाओं को (वेत्थ) = जानते हैं व प्राप्त कराते हैं, (तत्र) = वहाँ (हव्यानि गामय) = हव्य पदार्थों को भी प्राप्त कराइये । [२] हे प्रभो ! आपकी कृपा से हम देववृत्तिवाले बनकर, खूब उत्कृष्ट ज्ञान को प्राप्त करके, हृदय में नम्रता को धारण करें तथा जीवन में सदा हव्य पदार्थों का ही सेवन करनेवाले बनें। सदा यज्ञशेष का सेवन ही हव्य का सेवन है। हम हव्यों के ग्रहण के द्वारा ही प्रभु-पूजन करते हैं।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- हमारे हृदयों में ज्ञानी पुरुष की नम्रता हो तथा हम हव्य पदार्थों का सेवन करनेवाले -बनें।

स्वामी दयानन्द सरस्वती

अथ विद्याग्रहणविषयमाह ॥

अन्वय:

हे वनस्पते ! त्वं यत्र देवानां गुह्या नामानि वेत्थ तत्र हव्यानि गामय ॥१०॥

पदार्थान्वयभाषाः - (यत्र) अस्मिन् (वेत्थ) जानासि (वनस्पते) वनस्य पालक (देवानाम्) (गुह्या) गुप्तानि (नामानि) (तत्र) (हव्यानि) दातुमादातुमर्हाणि वस्तूनि (गामय) प्रापय। अत्र तुजादीनामिति दीर्घः ॥१०॥
भावार्थभाषाः - ये विदुषामन्तःस्थानि विद्याप्रभावेन जातानि नामानि जानन्ति ते पुष्कलं सुखं जनान् प्रापयन्ति ॥१०॥

डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - Lord of sun rays and master of vegetation and forests, wherever you know are the secret abodes of the divine powers of nature and their names and definitions, there guide our yajna to reach for knowledge and further development.

आचार्य धर्मदेव विद्या मार्तण्ड

The subject of the acquisition of knowledge is dealt with.

अन्वय:

O protector of the forests! where you know the unknown names of the learned persons, convey the articles worth giving and worth accepting.

भावार्थभाषाः - Those who know the names of the learned persons who have deep knowledge of the medicinal plants, they are able to bestow abundant happiness upon the people.

माता सविता जोशी

(यह अनुवाद स्वामी दयानन्द सरस्वती जी के आधार पर किया गया है।)
भावार्थभाषाः - जे विद्येच्या प्रभावामुळे विद्वानांच्या अन्तःकरणात उत्पन्न झालेली नावे जाणतात ते माणसांना खूप सुख प्राप्त करवून देतात ॥ १० ॥