सुस॑मिद्धाय शो॒चिषे॑ घृ॒तं ती॒व्रं जु॑होतन। अ॒ग्नये॑ जा॒तवे॑दसे ॥१॥
susamiddhāya śociṣe ghṛtaṁ tīvraṁ juhotana | agnaye jātavedase ||
सुऽस॑मिद्धाय। शो॒चिषे॑। घृ॒तम्। ती॒व्रम्। जु॒हो॒त॒न॒। अ॒ग्नये॑। जा॒तऽवे॑दसे ॥१॥
स्वामी दयानन्द सरस्वती
अब ग्यारह ऋचावाले पञ्चम सूक्त का आरम्भ है, उसके प्रथम मन्त्र में विद्वान् के विषय को कहते हैं ॥
हरिशरण सिद्धान्तालंकार
प्रभु प्राप्ति के लिये ज्ञान की साधना
स्वामी दयानन्द सरस्वती
अथ विद्वद्विषयमाह ॥
हे मनुष्या ! यूयं जातवेदसे सुसमिद्धाय शोचिषेऽग्नये तीव्रं घृतं जुहोतन ॥१॥
डॉ. तुलसी राम
आचार्य धर्मदेव विद्या मार्तण्ड
The duties of the learned men are stated.
O men ! put the oblations of well- purified (clarified butter), ghee into this well-ablaze purifying fire, which is existent in all the objects.
माता सविता जोशी
(यह अनुवाद स्वामी दयानन्द सरस्वती जी के आधार पर किया गया है।)या सूक्तात विद्वान, राजा, गृहस्थाश्रम, राजा, प्रजा व विद्याग्रहण यांचे वर्णन असल्यामुळे या सूक्ताच्या अर्थाची पूर्वसूक्ताच्या अर्थाबरोबर संगती जाणावी.
