यस्ते॒ साधि॒ष्ठोऽव॑स॒ इन्द्र॒ क्रतु॒ष्टमा भ॑र। अ॒स्मभ्यं॑ चर्षणी॒सहं॒ सस्निं॒ वाजे॑षु दु॒ष्टर॑म् ॥१॥
yas te sādhiṣṭho vasa indra kratuṣ ṭam ā bhara | asmabhyaṁ carṣaṇīsahaṁ sasniṁ vājeṣu duṣṭaram ||
यः। ते॒। साधि॑ष्ठः। अव॑से। इन्द्र॑। क्रतुः॑। तम्। आ। भ॒र॒। अ॒स्मभ्य॑म्। च॒र्ष॒णि॒ऽसह॑म्। सस्नि॑म्। वाजे॑षु। दु॒स्तर॑म् ॥१॥
स्वामी दयानन्द सरस्वती
अब आठ ऋचावाले पैंतीसवें सूक्त का आरम्भ है, उसके प्रथम मन्त्र में इन्द्रपदवाच्य राजगुणों का वर्णन करते हैं ॥
हरिशरण सिद्धान्तालंकार
साधिष्ठः क्रतुः
स्वामी दयानन्द सरस्वती
अथेन्द्रगुणानाह ॥
हे इन्द्र ! यस्तेऽवसे साधिष्ठः क्रतुरस्ति तं चर्षणीसहं सस्निं वाजेषु दुष्टरमस्मभ्यमा भर ॥१॥
डॉ. तुलसी राम
आचार्य धर्मदेव विद्या मार्तण्ड
The attributes of Indra are told.
O king illumined with justice like the sun, uphold for us that your intellect which is the guarantee of protection, which is capable to subdue men, is pure because of the observance of Brahmacharya (continence) and acquisition of knowledge. Such a king is difficult to be encountered in the battles.
माता सविता जोशी
(यह अनुवाद स्वामी दयानन्द सरस्वती जी के आधार पर किया गया है।)या सूक्तात इंद्र, राजा, प्रजा व विद्वानाच्या गुणांचे वर्णन करण्याने या सूक्ताच्या अर्थाची मागच्या सूक्ताच्या अर्थाबरोबर संगती जाणावी.
