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अध॒ क्रत्वा॑ मघव॒न्तुभ्यं॑ दे॒वा अनु॒ विश्वे॑ अददुः सोम॒पेय॑म्। यत्सूर्य॑स्य ह॒रितः॒ पत॑न्तीः पु॒रः स॒तीरुप॑रा॒ एत॑शे॒ कः ॥५॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

adha kratvā maghavan tubhyaṁ devā anu viśve adaduḥ somapeyam | yat sūryasya haritaḥ patantīḥ puraḥ satīr uparā etaśe kaḥ ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

अध॑। क्रत्वा॑। म॒घ॒ऽव॒न्। तुभ्य॑म्। दे॒वाः। अनु॑। विश्वे॑। अ॒द॒दुः॒। सोम॒ऽपेय॑म्। यत्। सूर्य॑स्य। ह॒रितः। पत॑न्तीः। पु॒रः। स॒तीः। उप॑राः। एत॑शे। क॒रिति॒ कः ॥५॥

ऋग्वेद » मण्डल:5» सूक्त:29» मन्त्र:5 | अष्टक:4» अध्याय:1» वर्ग:23» मन्त्र:5 | मण्डल:5» अनुवाक:2» मन्त्र:5


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स्वामी दयानन्द सरस्वती

अब विद्वद्विषय को कहते हैं ॥

पदार्थान्वयभाषाः - हे (मघवन्) बहुत धन से युक्त ! (यत्) जो (सूर्यस्य) सूर्य्य के (पतन्तीः) चलती हुई (पुरः) पालनेवाली वा आगे से (सतीः) विद्यमान (उपराः) समीप में रमती हुई (हरितः) हरिद्वर्ण किरणों को (एतशे) घोड़े पर घोड़े के चढ़नेवाले के सदृश (कः) करता है, उसकी विद्या से (तुभ्यम्) आपके लिये जो (विश्वे) सम्पूर्ण (देवाः) विद्वान् जन (सोमपेयम्) सोम ओषधि के पान करने योग्य रस को (अनु, अददुः) अनुकूल देते हैं, वे (अध) इसके अनन्तर (क्रत्वा) बुद्धि से विशेष ज्ञानी होते हैं ॥५॥
भावार्थभाषाः - हे मनुष्यो ! सूर्य्यमण्डल में अनेक तत्त्वों के विद्यमान होने से अनेक रूप देख पढ़ते हैं, यह जानना चाहिये ॥५॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

सोमरक्षण से प्रभुप्राप्ति -

पदार्थान्वयभाषाः - १. (अध) = अब (मघवन्) = ऐश्वर्यशालिन् प्रभो! (तुभ्यम्) = आपकी प्राप्ति के लिए (कृत्वा) = ज्ञान व शक्ति की प्राप्ति के हेतु से (विश्वेदेवाः) = सब देव (सोमपेयं) = सोम के पान को (अनु अददुः) = अनुकूलता से प्राप्त कराते हैं। देववृत्तियों के होने पर सोमरक्षण का सम्भव होता है। यही देवों का 'सोमपेय का दान' है। आसुरभाव ही सोम विनाश का कारण बनते हैं। सोमरक्षण के होने पर शक्ति व प्रज्ञान की प्राप्ति होती है। ये शक्ति व प्रज्ञान हमें प्रभु प्राप्ति का पात्र बनाते हैं २. जब हम प्रभु को प्राप्त करते हैं तो यह वह समय होता है (यत्) = जब कि वे प्रभु (सूर्यस्य) = ज्ञानसूर्य की (पतन्ती:) = चारों ओर फैलती हुई (हरितः) = रश्मियों को (पुरः सती:) = सामने होती हुई तथा (उपरा:) [Nearer] = अधिक समीप (एतशे) = इस ज्ञानदीप्त [shining] पुरुष के निमित्त (कः) = करते हैं। हम प्रभु को प्राप्त करते हैं, प्रभु हमें ज्ञानरश्मियों को प्राप्त कराते हैं ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- दिव्यगुणों को धारण करने के प्रयत्न से हम सोम का रक्षण करते हैं। सोमरक्षण से प्रज्ञान व शक्ति प्राप्त होती है। इससे हम प्रभु प्राप्ति के योग्य बनते हैं। प्रभु हमारे लिए ज्ञानरश्मियों को प्राप्त कराते हैं ।
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स्वामी दयानन्द सरस्वती

अथ विद्वद्विषयमाह ॥

अन्वय:

हे मघवन् ! यत्सूर्यस्य पतन्तीः पुरः सतीरुपरा हरित एतशे कस्तस्य विद्यया तुभ्यं ये विश्वे देवाः सोमपेयमन्वददुस्तेऽध क्रत्वा विज्ञानिनो भवन्ति ॥५॥

पदार्थान्वयभाषाः - (अध) अथ (क्रत्वा) प्रज्ञया (मघवन्) बहुधननुक्त (तुभ्यम्) (देवाः) विद्वांसः (अनु) (विश्वे) सर्वे (अददुः) ददति (सोमपेयम्) सोमस्य पातव्यं रसम् (यत्) यः (सूर्य्यस्य) (हरितः) हरितवर्णाः किरणाः (पतन्तीः) गच्छन्तीः (पुरः) पालिकाः पुरस्ताद्वा (सतीः) विद्यमानाः (उपराः) समीपे रममाणाः (एतशे) अश्वेऽश्विक इव (कः) करोति ॥५॥
भावार्थभाषाः - हे मनुष्याः ! सूर्य्यमण्डलेऽनेकेषां तत्त्वानां विद्यमानत्वादेनकानि रूपाणि दृश्यन्त इति विज्ञेयम् ॥५॥
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - And further, O lord of honour and power of omnipotence, all the divinities of nature and humanity offer you the drink of soma in response to your yajnic action of systemic integration and sustenance when the various rays of the sun radiating forward all round and nourishing life stop on the planet on your behest (to feed life and drink up the sweet juices of soma).
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आचार्य धर्मदेव विद्या मार्तण्ड

The knowledge preached by the learned people is praised.

अन्वय:

O king ! he knows the nature of the sustaining rays of the sun falling from the front. Sporting near us (so to speak) like a rider on the horse, because of the knowledge given by him, all learned persons give you the good and worth- drinking juice of the Soma, and thus they become scientists by using their sharp intellect.

भावार्थभाषाः - O men! as there are various elements in the solar system; many kinds of forms are seen. You should know their characters.
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माता सविता जोशी

(यह अनुवाद स्वामी दयानन्द सरस्वती जी के आधार पर किया गया है।)
भावार्थभाषाः - हे माणसांनो! सूर्यमंडळात अनेक तत्त्वे विद्यमान असल्यामुळे, अनेक रूपे दिसून येतात, हे जाणले पाहिजे. ॥ ५ ॥