यज॑मानाय सुन्व॒त आग्ने॑ सु॒वीर्यं॑ वह। दे॒वैरा स॑त्सि ब॒र्हिषि॑ ॥५॥
yajamānāya sunvata āgne suvīryaṁ vaha | devair ā satsi barhiṣi ||
यज॑मानाय। सु॒न्व॒ते। आ। अ॒ग्ने॒। सु॒ऽवीर्य॑म्। व॒ह॒। दे॒वैः। आ। स॒त्सि॒। ब॒र्हिषि॑ ॥५॥
स्वामी दयानन्द सरस्वती
फिर उसी विषय को कहते हैं ॥
हरिशरण सिद्धान्तालंकार
यजमान+सुन्वत्
स्वामी दयानन्द सरस्वती
पुनस्तमेव विषयमाह ॥
हे अग्ने ! त्वं देवैः सह बर्हिषि सत्सि सुन्वते यजमानाय सुवीर्यमा वह यज्ञमा यज ॥५॥
डॉ. तुलसी राम
आचार्य धर्मदेव विद्या मार्तण्ड
The same subject is continued.
O learned person ! give good vigor to liberal institutor of the Yajna who is seated in a very good assembly and conduct the Yajna (non-violent sacrifice).
