वांछित मन्त्र चुनें
382 बार पढ़ा गया

यज॑मानाय सुन्व॒त आग्ने॑ सु॒वीर्यं॑ वह। दे॒वैरा स॑त्सि ब॒र्हिषि॑ ॥५॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

yajamānāya sunvata āgne suvīryaṁ vaha | devair ā satsi barhiṣi ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

यज॑मानाय। सु॒न्व॒ते। आ। अ॒ग्ने॒। सु॒ऽवीर्य॑म्। व॒ह॒। दे॒वैः। आ। स॒त्सि॒। ब॒र्हिषि॑ ॥५॥

382 बार पढ़ा गया
ऋग्वेद » मण्डल:5» सूक्त:26» मन्त्र:5 | अष्टक:4» अध्याय:1» वर्ग:19» मन्त्र:5 | मण्डल:5» अनुवाक:2» मन्त्र:5


स्वामी दयानन्द सरस्वती

फिर उसी विषय को कहते हैं ॥

पदार्थान्वयभाषाः - हे (अग्ने) विद्वन् ! आप (देवैः) विद्वानों के साथ (बर्हिषि) अति उत्तम (सत्सि) सभा में (सुन्वते) यज्ञ करते हुए (यजमानाय) दाता जन के लिये (सुवीर्यम्) उत्तम पराक्रम को (आ, वह) प्राप्त हूजिये और यज्ञ को (आ) अच्छे प्रकार करिये ॥५॥
भावार्थभाषाः - हे मनुष्यो ! पालन करनेवाले जन के लिये आप लोग सुख सदा ही दीजिये और सब प्रजा की सभा से सब व्यवहारों का निश्चय कीजिये ॥५॥

हरिशरण सिद्धान्तालंकार

यजमान+सुन्वत्

पदार्थान्वयभाषाः - १. (यजमानाय) = यज्ञशील और यज्ञशीलता के द्वारा (सुन्वते) = सोम का सम्पादन करनेवाले पुरुष के लिए हे (अग्ने) = परमात्मन्! आप (सुवीर्यम्) = उत्तम बल व पराक्रम को (आवह) = प्राप्त कराइए । यज्ञों में लगे रहने से हम वासनाओं से आक्रान्त नहीं होते और सोमरक्षण के द्वारा सुवीर्य को प्राप्त करते हैं। २. ऐसा होने पर हे प्रभो! आप (बर्हिषि) = हमारे वासनाशून्य हृदयों में (देवैः) = सब दिव्यगुणों के साथ (आसत्सि) = आसीन होते हैं ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- हम यज्ञशील बनें। वासनाओं से बचे रहकर सोम का रक्षण करें। यही दिव्यगुणों व प्रभु की प्राप्ति का मार्ग है।

स्वामी दयानन्द सरस्वती

पुनस्तमेव विषयमाह ॥

अन्वय:

हे अग्ने ! त्वं देवैः सह बर्हिषि सत्सि सुन्वते यजमानाय सुवीर्यमा वह यज्ञमा यज ॥५॥

पदार्थान्वयभाषाः - (यजमानाय) दात्रे (सुन्वते) यज्ञं निष्पादयते (आ) (अग्ने) विद्वन् (सुवीर्यम्) (वह) प्राप्नुहि (देवैः) विद्वद्भिः (आ) (सत्सि) सभायाम् (बर्हिषि) अत्युत्तमायाम् ॥५॥
भावार्थभाषाः - हे मनुष्याः ! पालकाय जनाय यूयं सुखं सदैव दत्त सर्वेषां सभया सर्वान् व्यवहारान् निश्चिनुत ॥५॥

डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - Agni, giver of the prizes of yajna, come with the divinities, sit with the nobilities on the holy grass in the holy assembly, bearing noble vigour and splendour for the host of yajna who prepares and offers the pleasure and power of peace and excellence in the yajna and bless him and all.

आचार्य धर्मदेव विद्या मार्तण्ड

The same subject is continued.

अन्वय:

O learned person ! give good vigor to liberal institutor of the Yajna who is seated in a very good assembly and conduct the Yajna (non-violent sacrifice).

भावार्थभाषाः - O men, you should always give happiness to a person who protects or nourishes you. Decide every thing about the dealings by putting it before an assembly.

माता सविता जोशी

(यह अनुवाद स्वामी दयानन्द सरस्वती जी के आधार पर किया गया है।)
भावार्थभाषाः - हे माणसांनो ! पालकांना तुम्ही सदैव सुख द्या व सर्वांच्या सभेद्वारे सर्व व्यवहारांचा निश्चय करा. ॥ ५ ॥