अग्ने॒ सह॑न्त॒मा भ॑र द्यु॒म्नस्य॑ प्रा॒सहा॑ र॒यिम्। विश्वा॒ यश्च॑र्ष॒णीर॒भ्या॒३॒॑सा वाजे॑षु सा॒सह॑त् ॥१॥
agne sahantam ā bhara dyumnasya prāsahā rayim | viśvā yaś carṣaṇīr abhy āsā vājeṣu sāsahat ||
अग्ने॑। सह॑न्तम्। आ। भ॒र॒। द्यु॒म्नस्य॑। प्र॒ऽसहा॑। र॒यिम्। विश्वाः॑। यः। च॒र्ष॒णीः। अ॒भि। आ॒सा। वाजे॑षु। स॒सह॑त् ॥१॥
स्वामी दयानन्द सरस्वती
अब चार ऋचावाले तेईसवें सूक्त का आरम्भ है, उसके प्रथम मन्त्र में अग्निपदवाच्य वीर के गुणों का उपदेश करते हैं ॥
हरिशरण सिद्धान्तालंकार
आन्तर व बाह्य शत्रुओं का विजय
स्वामी दयानन्द सरस्वती
अथाग्निपदवाच्यवीरगुणानाह ॥
हे अग्ने वीर ! यो विश्वाः प्रासहा चर्षणीर्वाजेषु सासहदासाभ्युपदिशेत्तं शत्रुबलं सहन्तं द्युम्नस्य रयिं त्वमा भर ॥१॥
डॉ. तुलसी राम
आचार्य धर्मदेव विद्या मार्तण्ड
The attributes of Agni (a brave person) are told.
O brave person ! you are full of splendor like the fire, give us wealth of good reputation because it overcomes all powerful and glorious armies and gives inspiring and exhorting teachings with your mouth.
माता सविता जोशी
(यह अनुवाद स्वामी दयानन्द सरस्वती जी के आधार पर किया गया है।)या सूक्तात अग्नीच्या गुणांचे वर्णन असल्याप्रमाणे या सूक्ताच्या अर्थाची पूर्वसूक्तार्थाबरोबर संगती जाणावी.
