चि॒कि॒त्विन्म॑नसं त्वा दे॒वं मर्ता॑स ऊ॒तये॑। वरे॑ण्यस्य॒ तेऽव॑स इया॒नासो॑ अमन्महि ॥३॥
cikitvinmanasaṁ tvā devam martāsa ūtaye | vareṇyasya te vasa iyānāso amanmahi ||
चि॒कि॒त्वित्ऽम॑नसम्। त्वा॒। दे॒वम्। मर्ता॑सः। ऊ॒तये॑। वरे॑ण्यस्य। ते॒। अव॑सः। इ॒या॒नासः॑। अ॒म॒न्म॒हि॒ ॥३॥
स्वामी दयानन्द सरस्वती
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥
हरिशरण सिद्धान्तालंकार
प्रभु के वरणीय रक्षण का ध्यान ऋषभः ॥
स्वामी दयानन्द सरस्वती
पुनस्तमेव विषयमाह ॥
हे विद्वन् ! वरेण्यस्याऽवसस्ते सङ्गेनेयानासो मर्त्तासो वयमूतये चिकित्विन्मनसं देवं त्वाऽग्निमिवामन्महि ॥३॥
डॉ. तुलसी राम
आचार्य धर्मदेव विद्या मार्तण्ड
The subject of Agni is further described.
O learned person! let us the mortals know you well, because you are endowed with enlightened mind. We approach you by the association of your desirable protective cover shining and purifying.
