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जु॒हु॒रे वि चि॒तय॒न्तोऽनि॑मिषं नृ॒म्णं पा॑न्ति। आ दृ॒ळ्हां पुरं॑ विविशुः ॥२॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

juhure vi citayanto nimiṣaṁ nṛmṇam pānti | ā dṛḻhām puraṁ viviśuḥ ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

जु॒हु॒रे। वि। चि॒तय॑न्तः। अनि॑ऽमिषम्। नृ॒म्णम्। पा॒न्ति॒। आ। दृ॒ळ्हाम्। पुर॑म्। वि॒वि॒शुः॒ ॥२॥

ऋग्वेद » मण्डल:5» सूक्त:19» मन्त्र:2 | अष्टक:4» अध्याय:1» वर्ग:11» मन्त्र:2 | मण्डल:5» अनुवाक:2» मन्त्र:2


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स्वामी दयानन्द सरस्वती

फिर उसी विषय को कहते हैं ॥

पदार्थान्वयभाषाः - जो (अनिमिषम्) दिन-रात्रि (चितयन्तः) बोध कराते हुए (वि) विरुद्ध (जुहुरे) कुटिलता करते और (नृम्णम्) धन की (पान्ति) रक्षा करते हैं, वे (दृळ्हाम्) दृढ़ (पुरम्) नगर को (आ, विविशुः) सब प्रकार प्राप्त होते हैं ॥२॥
भावार्थभाषाः - जो सरल स्वभाववाले और सत्य के बोधक प्रतिक्षण पुरुषार्थ करते हैं, वे राज्य और ऐश्वर्य को प्राप्त होते हैं ॥२॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

सद्गृहस्थ

पदार्थान्वयभाषाः - [१] गृहस्थ में आने पर गतमन्त्र के वव्रि (विचितयन्तः) = प्रभु के चिन्तन से व वेदमाता की उपासना से [स्वाध्याय से] विशिष्ट चेतनावाले होते हुए ये (जुहुरे) = सदा अग्निहोत्र करनेवाले होते हैं 'जरामर्यं वा सत्रं यदग्निहोत्रम्'। इस प्रकार ध्यान व यज्ञों में प्रवृत्त ये पुरुष (अनिमिषम्) = बिना किसी प्रमाद के निरन्तर (नृम्णम्) = बल का पान्ति रक्षण करते हैं । [२] इस प्रकार बल का रक्षण करते हुए ये (दृढां पुरम्) = बड़े दृढ़ इस शरीर में (आविविशुः) = प्रविष्ट होते हैं। अपने शरीर को बड़ा दृढ़ बनाये रखते हैं। 'अश्मा भवतु नस्तनूः'। इनका शरीर रोगों के लिये एक (दुर्भेद्य) = दुर्ग के समान होता है, रोग उसमें प्रविष्ट नहीं हो पाते।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- हम ध्यान करें, यज्ञशील हों। अपने बल का रक्षण करें, शरीर को रोगों के लिये दुर्भेद्य दुर्ग बनयें ।
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स्वामी दयानन्द सरस्वती

पुनस्तमेव विषयमाह ॥

अन्वय:

येऽनिमिषं चितयन्तो वि जुहुरे नृम्णं पान्ति ते दृळ्हां पुरमा विविशुः ॥२॥

पदार्थान्वयभाषाः - (जुहुरे) कुटिलयन्ति (वि) विरुद्धे (चितयन्तः) ज्ञापयन्तः (अनिमिषम्) अहर्निशम् (नृम्णम्) धनम् (पान्ति) रक्षन्ति (आ) (दृळ्हाम्) (पुरम्) नगरम् (विविशुः) आविशन्ति ॥२॥
भावार्थभाषाः - ये सरलस्वभावाः सत्यविज्ञापकाः प्रतिक्षणं पुरुषार्थयन्ते ते राज्यैश्वर्य्यं लभन्ते ॥२॥
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - Those who challenge adverse circumstances and sit by Agni, light of Divinity, day and night without a wink of sleep, they enter the adamantine city celestial.
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आचार्य धर्मदेव विद्या मार्तण्ड

More stated about the teachings from the enlightened persons.

अन्वय:

The persons who enlighten others day and night behave not crookedly but uprightly. They protect wealth (internal as well as external) enter into a strong city.

भावार्थभाषाः - The persons of upright nature are enlighteners of truth and are engaged in doing good work every moment. They bring prosperity to the State.
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माता सविता जोशी

(यह अनुवाद स्वामी दयानन्द सरस्वती जी के आधार पर किया गया है।)
भावार्थभाषाः - जे सरळ स्वभावाचे, सत्यबोधक असून प्रतिक्षणी पुरुषार्थ करतात त्यांना राज्य व ऐश्वर्य लाभते. ॥ २ ॥