अ॒ग्निं स्तोमे॑न बोधय समिधा॒नो अम॑र्त्यम्। ह॒व्या दे॒वेषु॑ नो दधत् ॥१॥
agniṁ stomena bodhaya samidhāno amartyam | havyā deveṣu no dadhat ||
अ॒ग्निम्। स्तोमे॑न। बो॒ध॒य॒। स॒म्ऽइ॒धा॒नः। अम॑र्त्यम्। ह॒व्या। दे॒वेषु॑। नः॒। द॒ध॒त् ॥१॥
स्वामी दयानन्द सरस्वती
अब छः ऋचावाले चौदहवें सूक्त का आरम्भ है, उसके प्रथम मन्त्र में अग्निगुणों को कहते हैं ॥
हरिशरण सिद्धान्तालंकार
हव्या देवेषु नो दधत्
स्वामी दयानन्द सरस्वती
अथाग्निगुणानाह ॥
हे विद्वन् ! यस्समिधानोऽग्निर्देवेषु नो हव्या दधत् तममर्त्यमग्निं स्तोमेन बोधय ॥१॥
डॉ. तुलसी राम
आचार्य धर्मदेव विद्या मार्तण्ड
The properties of Agni (fire) are told.
O learned person! awaken that immortal Agni (fire) with praise of its properties which is well-kindled and takes the articles worth-giving and accepting (them. Ed.) put. into it the divine objects or in the enlightened men.
माता सविता जोशी
(यह अनुवाद स्वामी दयानन्द सरस्वती जी के आधार पर किया गया है।)या सूक्तात अग्नीच्या गुणाचे वर्णन असल्यामुळे या सूक्ताच्या अर्थाची पूर्वसूक्तार्थाबरोबर संगती जाणावी.
