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अग्ने॑ ने॒मिर॒राँ इ॑व दे॒वाँस्त्वं प॑रि॒भूर॑सि। आ राध॑श्चि॒त्रमृ॑ञ्जसे ॥६॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

agne nemir arām̐ iva devām̐s tvam paribhūr asi | ā rādhaś citram ṛñjase ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

अग्ने। नेमिः। अ॒रान्ऽइ॑व। दे॒वान्। त्वम्। प॒रि॒ऽभूः। अ॒सि॒। आ। राधः॑। चि॒त्रम्। ऋ॒ञ्ज॒से॒ ॥६॥

ऋग्वेद » मण्डल:5» सूक्त:13» मन्त्र:6 | अष्टक:4» अध्याय:1» वर्ग:5» मन्त्र:6 | मण्डल:5» अनुवाक:1» मन्त्र:6


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स्वामी दयानन्द सरस्वती

फिर उसी विषय को कहते हैं ॥

पदार्थान्वयभाषाः - हे (अग्ने) विद्वन् ! (त्वम्) आप जैसे (नेमिः) रथाङ्ग (अरानिव) चक्रों के अङ्गों को वैसे (देवान्) श्रेष्ठ गुणों वा विद्वानों को (परिभूः) सब प्रकार से हुवानेवाले (असि) हो और (चित्रम्) विचित्र (राधः) धन को (आ, ऋञ्जसे) सिद्ध करते हो, इससे सत्कार करने योग्य हो ॥६॥
भावार्थभाषाः - इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। जैसे अरादिकों से चक्र उत्तम प्रकार शोभित होता है, वैसे ही विद्वानों और उत्तम गुणों से मनुष्य शोभित होते हैं ॥६॥ इस सूक्त में अग्नि और विद्वान् के गुण वर्णन करने से इस सूक्त के अर्थ की इस से पूर्व सूक्त के अर्थ के साथ सङ्गति जाननी चाहिये ॥ यह तेरहवाँ सूक्त और पाँचवाँ वर्ग समाप्त हुआ ॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

चित्रं राधः

पदार्थान्वयभाषाः - [१] हे (अग्ने) = सर्वाग्रणी प्रभो ! (त्वम्) = आप (देवान्) = सब देवों को (परिभूः) = व्याप्त करके (असि) = विद्यमान हो रहे हैं, (इव) = जैसे कि (नेमिः) = चक्रवलय (अरान्) = अरों को [spokes] व्याप्त करके विद्यमान होता है। सब देवों को देवत्व आपकी व्याप्ति से ही प्राप्त हो रहा है 'तेन देवा देवतामग्र आयन्'। [२] आप ही उस उस देव के उस उस (चित्रं राधः) = अद्भुत ऐश्वर्य को (आ ऋञ्जसे) = सर्वथा प्रसाधित करते हैं। सूर्य आदि को दीप्ति के देनेवाले आप ही हैं। बुद्धिमानों को बुद्धि के दाता, तेजस्वियों के तेज व बलवानों के बल आप ही हैं ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- प्रभु ही सब देवों में व्याप्त होकर उस उस विभूति श्री व ऊर्ज् को उनमें स्थापित कर रहे हैं । अगले सूक्त में भी 'सुतम्भर आत्रेय' ही प्रभु का स्तवन करता हुआ कहता है कि -
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स्वामी दयानन्द सरस्वती

पुनस्तमेव विषयमाह ॥

अन्वय:

हे अग्ने ! त्वं नेमिररानिव देवान् परिभूरसि चित्रं राध आ ऋञ्जसे तस्मात् सत्कर्त्तव्योऽसि ॥६॥

पदार्थान्वयभाषाः - (अग्ने) विद्वान् (नेमिः) रथाङ्गम् (अरानिव) चक्राङ्गानीव (देवान्) दिव्यान् गुणान् विदुषो वा (त्वम्) (परिभूः) सर्वतो भावयिता (असि) (आ) (राधः) धनम् (चित्रम्) (ऋञ्जसे) प्रसाध्नोसि ॥६॥
भावार्थभाषाः - अत्रोपमालङ्कारः । यथाऽरादिभिश्चक्रं सुशोभते तथैव विद्वद्भिः शुभैर्गुणैश्च मनुष्याः शोभन्त इति ॥६॥ अत्राग्निविद्वद्गुणवर्णनादेतदर्थस्य पूर्वसूक्तार्थेन सह सङ्गतिर्वेद्या ॥ इति त्रयोदशं सूक्तं पञ्चमो वर्गश्च समाप्तः ॥
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - Agni, just as the felly of a wheel holds and surrounds the spokes of the wheel, you hold and reign over the brilliancies and divinities of nature and humanity, and you create and refine all the wonderful varieties of the world’s wealth for us.
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आचार्य धर्मदेव विद्या मार्तण्ड

The subject of enlightened person is further developed.

अन्वय:

O learned person ! you encompass the divine virtues or enlightened men from all sides, like the circumference surrounds spokes of a wheel. Because you accomplish (earn well) wonderful wealth (of wisdom ), therefore, you are worthy of veneration.

भावार्थभाषाः - There is simile here. As the wheel is adorned with the spokes etc., so men are adorned with the association of the enlightened persons and good virtues.
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माता सविता जोशी

(यह अनुवाद स्वामी दयानन्द सरस्वती जी के आधार पर किया गया है।)
भावार्थभाषाः - या मंत्रात उपमालंकार आहे. जसे आरे इत्यादीमुळे चक्र उत्तम प्रकारे शोभते तसेच विद्वत्ता व उत्तम गुण यामुळे माणसे शोभून दिसतात. ॥ ६ ॥