वांछित मन्त्र चुनें

शुना॑सीरावि॒मां वाचं॑ जुषेथां॒ यद्दि॒वि च॒क्रथुः॒ पयः॑। तेने॒मामुप॑ सिञ्चतम् ॥५॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

śunāsīrāv imāṁ vācaṁ juṣethāṁ yad divi cakrathuḥ payaḥ | tenemām upa siñcatam ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

शुना॑सीरौ। इ॒माम्। वाच॑म्। जु॒षे॒था॒म्। यत्। दि॒वि। च॒क्रथुः॑। पयः॑। तेन॑। इ॒माम्। उप॑। सि॒ञ्च॒त॒म् ॥५॥

ऋग्वेद » मण्डल:4» सूक्त:57» मन्त्र:5 | अष्टक:3» अध्याय:8» वर्ग:9» मन्त्र:5 | मण्डल:4» अनुवाक:5» मन्त्र:5


0 बार पढ़ा गया

स्वामी दयानन्द सरस्वती

फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥

पदार्थान्वयभाषाः - हे (शुनासीरौ) क्षेत्र के स्वामी और भृत्य ! आप दोनों (यत्) जिस (इमाम्) इस कृषिविद्या की प्रकाश करनेवाली (वाचम्) वाणी और (पयः) जल को (दिवि) कृषिविद्या के प्रकाश में (चक्रथुः) करते हैं उनकी (जुषेथाम्) सेवा करो (तेन) इससे (इमाम्) इस भूमि को (उप, सिञ्चतम्) सींचो ॥५॥
भावार्थभाषाः - खेती करनेवाले जन प्रथम खेती के करने की विद्या को ग्रहण करके पश्चात् यथायोग्य खेती कर धन और धान्य से युक्त सदा हों ॥५॥
0 बार पढ़ा गया

हरिशरण सिद्धान्तालंकार

शुनासीरौ

पदार्थान्वयभाषाः - [१] 'शुनो वायुः शु एति अन्तरिक्षे, सीर: आदित्यः सरणात्' नि० ९।४० के अनुसार (शुनासीरौ) = वायु और सूर्य (इमां वाचं जुषेथाम्) = हमारी इस वाणी का प्रीतिपूर्वक सेवन करें, (यत्) = कि (दिवि) = द्युलोक में ये (पयः चक्रथुः) = जल को करें और (तेन) = उस जल से (इमाम्) = इस भूमि को (उपसिञ्चतम्) = सींचें। [२] सूर्य से ही जल वाष्पीभूत होकर द्युलोक में पहुँचता है और उससे बने हुए पर्जन्यों को वायुएँ ही उस उस स्थान पर प्राप्त कराती हैं। इन दोनों के द्वारा जल से सींची गयी यह पृथिवी जिस अन्न को पैदा करती है, वह सर्वाधिक गुणकारी होता है।
भावार्थभाषाः - भावार्थ - वायु व सूर्य द्युलोक में मेघों को जन्म देकर पृथिवी को सींचें और हमें मधुर अन्न प्राप्त कराएँ
0 बार पढ़ा गया

स्वामी दयानन्द सरस्वती

पुनस्तमेव विषयमाह ॥

अन्वय:

हे शुनासीरौ ! युवां यद्यामिमां वाचं पयश्च दिवि चक्रथुस्ते जुषेथां तेनेमामुप सिञ्चतम् ॥५॥

पदार्थान्वयभाषाः - (शुनासीरौ) क्षेत्रपतिभृत्यौ (इमाम्) कृषिविद्याप्रकाशिकां (वाचम्) वाणीम् (जुषेथाम्) सेवेथाम् (यत्) यम् (दिवि) कृषिविद्याप्रकाशे (चक्रथुः) (पयः) उदकम् (तेन) (इमाम्) भूमिम् (उप) (सिञ्चतम्) ॥५॥
भावार्थभाषाः - कृषीवलाः पूर्वं कृषिविद्यां गृहीत्वा पुनर्यथायोग्यां कृषिं कृत्वा धनधान्ययुक्ताः सदा भवन्तु ॥५॥
0 बार पढ़ा गया

डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - O Vayu and Aditya, wind and sun, farmer and helpers, listen to this word and follow: the water which you create in the regions of light, and which you move in the light of science, pray bring down to irrigate this holy land of the fields.
0 बार पढ़ा गया

आचार्य धर्मदेव विद्या मार्तण्ड

The same subject of farming is continued.

अन्वय:

O master and servant of the field ! sprinkle this earth with the water and the speech by throwing light on the subject of agriculture, that you have acquired in the field of the science of agriculture and which you serve so well.

भावार्थभाषाः - The farmers should first learn the science of agriculture and then take up the farming, and thus possess wealth and food grains.
0 बार पढ़ा गया

माता सविता जोशी

(यह अनुवाद स्वामी दयानन्द सरस्वती जी के आधार पर किया गया है।)
भावार्थभाषाः - शेतकऱ्यांनी प्रथम कृषिविद्या ग्रहण करावी व नंतर यथायोग्य शेती करून सदैव धनधान्यांनी युक्त असावे. ॥ ५ ॥