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देवता: उषाः ऋषि: वामदेवो गौतमः छन्द: गायत्री स्वर: षड्जः

आ द्यां त॑नोषि र॒श्मिभि॒रान्तरि॑क्षमु॒रु प्रि॒यम्। उषः॑ शु॒क्रेण॑ शो॒चिषा॑ ॥७॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

ā dyāṁ tanoṣi raśmibhir āntarikṣam uru priyam | uṣaḥ śukreṇa śociṣā ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

आ। द्याम्। त॒नो॒षि॒। र॒श्मिऽभिः॑। आ। अ॒न्तरि॑क्षम्। उ॒रु। प्रि॒यम्। उषः॑। शु॒क्रेण॑। शो॒चिषा॑ ॥७॥

ऋग्वेद » मण्डल:4» सूक्त:52» मन्त्र:7 | अष्टक:3» अध्याय:8» वर्ग:3» मन्त्र:7 | मण्डल:4» अनुवाक:5» मन्त्र:7


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स्वामी दयानन्द सरस्वती

फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥

पदार्थान्वयभाषाः - हे (उषः) प्रभात वेला के सदृश वर्त्तमान स्त्री जैसे प्रभातवेला (रश्मिभिः) किरणों से (द्याम्) प्रकाश और (उरु) बहुत (आ, अन्तरिक्षम्) सब ओर से अन्तरिक्ष को प्रकाशित करती है, वैसे ही तू (शुक्रेण) शुद्ध (शोचिषा) प्रकाश से (प्रियम्) सुन्दर पति का (आ, तनोषि) विस्तार करती अर्थात् पति की कीर्त्ति बढ़ाती है, इससे सत्कार करने योग्य है ॥७॥
भावार्थभाषाः - इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। वही स्त्री बहुत सुख को प्राप्त होती है, जो विद्या, विनय और उत्तम स्वभावादिकों से अपने पति को नित्य प्रसन्न करती है ॥७॥ इस सूक्त में प्रभातवेला के सदृश स्त्रियों के गुण वर्णन करने से इस सूक्त के अर्थ की पूर्व सूक्त के अर्थ के साथ सङ्गति जाननी चाहिये ॥७॥ यह बावन ५२ वाँ सूक्त और तृतीय वर्ग समाप्त हुआ ॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

'द्यां अन्तरिक्षम्'

पदार्थान्वयभाषाः - (१) (उष:) = हे उषे ! तू (द्याम्) = हमारे मस्तिष्करूप द्युलोक को (रश्मिभिः) = ज्ञानरश्मियों से (आ तनोषि) = समन्तात् आतत [व्याप्त] करती है । [२] तथा (उरु) = विशाल (प्रियम्) = प्रीतियुक्त, प्रसादमय (अन्तरिक्षम्) = हृदयान्तरिक्ष को (शुक्रेण शोचिसा) = चमकती हुई पवित्रता से- शुचिता से आतत करता है।
भावार्थभाषाः - भावार्थ– उषाकाल का जागरण यदि हमारे मस्तिष्करूप द्युलोक को ज्ञानरश्मियों से दीप्त करता है, तो हमारे तन को यह चमकती हुई पवित्रता से चमका देता है। उषाकाल की समाप्ति पर ज्ञान सूर्य का उदय होता है । सो अगला सूक्त सविता का है -
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स्वामी दयानन्द सरस्वती

पुनस्तमेव विषयमाह ॥

अन्वय:

हे उषरिव वर्त्तमाने स्त्रि ! यथोषा रश्मिभिर्द्यामुर्वाऽन्तरिक्षञ्च प्रकाशयति तथैव त्वं शुक्रेण शोचिषा प्रियं पतिमातनोषि तस्मात् सत्कर्त्तव्यासि ॥७॥

पदार्थान्वयभाषाः - (आ) (द्याम्) प्रकाशम् (तनोषि) विस्तृणासि (रश्मिभिः) किरणैः (आ) सर्वतः (अन्तरिक्षम्) (उरु) बहु (प्रियम्) कमनीयं पतिम् (उषः) (शुक्रेण) शुद्धेन (शोचिषा) प्रकाशेन ॥७॥
भावार्थभाषाः - अत्र वाचकलुप्तोपमालङ्कारः। सैव स्त्री बहुसुखं प्राप्नोति या विद्याविनयसुशीलादिभिः स्वपतिं सदैव प्रीणातीति ॥७॥ अत्रोषर्वत्स्त्रीगुणवर्णनादेतदर्थस्य पूर्वसूक्तार्थेन सह सङ्गतिर्वेद्या ॥७॥ इति द्विपञ्चाशत्तमं सूक्तं तृतीयो वर्गश्च समाप्तः ॥
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - O dawn, with your rays of light, you radiate and fill the wide heavens and the skies, and the regions of universal love, so do you bless your loved one with the purest light of love and bliss.$(Swami Dayananda interprets the dawn literally as well as metaphorically: The dawn is not only the light of the morning, daughter of the sun, but also the light of the home, blessed and beautiful lady of the house who fills the home with light and virtue and inspires her beloved husband with love and bliss.)
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आचार्य धर्मदेव विद्या मार्तण्ड

The same subject of woman comparable with is continued.

अन्वय:

O noble woman! you shine like the dawn. As the dawn illuminates the heaven as well as the vast firmament with its pure rays (luster), in the same manner, you make your dear husband renowned and glorious by your pure luster.

भावार्थभाषाः - That woman only enjoys much happiness who always satisfies her husband with knowledge, humility, good character and temperament and other virtuers.
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माता सविता जोशी

(यह अनुवाद स्वामी दयानन्द सरस्वती जी के आधार पर किया गया है।)
भावार्थभाषाः - या मंत्रात वाचकलुप्तोपमालंकार आहे. तीच स्त्री खूप सुख प्राप्त करू शकते जी विद्या, विनय व उत्तम स्वभावाने आपल्या पतीला प्रसन्न करते. ॥ ७ ॥