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अश्वे॑व चि॒त्रारु॑षी मा॒ता गवा॑मृ॒ताव॑री। सखा॑भूद॒श्विनो॑रु॒षाः ॥२॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

aśveva citrāruṣī mātā gavām ṛtāvarī | sakhābhūd aśvinor uṣāḥ ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

अश्वा॑ऽइव। चि॒त्रा। अरु॑षी। मा॒ता। गवा॑म्। ऋ॒तऽव॑री। सखा॑। अ॒भू॒त्। अ॒श्विनोः॑। उ॒षाः ॥२॥

ऋग्वेद » मण्डल:4» सूक्त:52» मन्त्र:2 | अष्टक:3» अध्याय:8» वर्ग:3» मन्त्र:2 | मण्डल:4» अनुवाक:5» मन्त्र:2


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स्वामी दयानन्द सरस्वती

फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥

पदार्थान्वयभाषाः - हे मनुष्यो ! जो (चित्रा) अद्भुत गुण, कर्म और स्वभावयुक्त (अरुषी) ईषत् लाल वर्ण (ऋतावरी) बहुत सत्य का प्रकाश करानेवाली (उषाः) प्रातर्वेला (अश्वेव) घोड़ी के सदृश वर्त्तमान (अश्विनोः) सूर्य और चन्द्रमा की (सखा) मित्र (अभूत्) हुई वह (गवाम्) किरणों की (माता) माता के सदृश पालन करनेवाली जाननी चाहिये ॥२॥
भावार्थभाषाः - इस मन्त्र में उपमालङ्कार है । हे मनुष्यो ! जो माता और मित्र के सदृश वर्त्तमान प्रातर्वेला है, वह युक्ति से सब पुरुषों से सेवन करने योग्य है ॥२॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

'अरुषी-ऋतावरी' उषा

पदार्थान्वयभाषाः - [१] (अश्वा इव) = [अश् व्याप्तौ] जैसे यह उषा कर्मों में व्याप्त होनेवाली है, उसी प्रकार (चित्रा) = ज्ञान को देनेवाली है। (अरुषी) = आरोचमान है, (गवां माता) = प्रकाश की किरणों का निर्माण करनेवाली है, ऋतावरी यह ऋतवाली है- यज्ञोंवाली है। हमें प्रातः प्रबुद्ध होकर कर्त्तव्यकर्मों में लग जाना चाहिए। ज्ञानप्राप्ति के लिए यत्नशील होना चाहिए। हम इस उषा जागरण से अपने जीवन को आरोचमान तेजस्वी बनाएँ । स्वाध्याय द्वारा अपने ज्ञानप्रकाश को बढ़ाते हुए हम यज्ञशील हों। [२] प्रातः प्राणसाधना का उषाकाल (अश्विनो:) = प्राणापान का (सखा अभूत्) = मित्र होता है, अर्थात् इस उषाकाल में प्राणसाधना चलती है। प्रातः प्रबुद्ध होकर, स्नानादि शुद्धि करके, हम सूर्याभिमुख बैठकर प्रतिदिन प्राणापान का अभ्यास करें।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- प्रातः प्रबुद्ध होकर अपने कर्त्तव्यकर्मों में हम लगें, स्वाध्याय करें और यज्ञ में प्रवृत्त हों। प्राणसाधना करें।
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स्वामी दयानन्द सरस्वती

पुनस्तमेव विषयमाह ॥

अन्वय:

हे मनुष्या ! या चित्राऽरुष्यृतावरी उषा अश्वेवाश्विनोः सखाऽभूत् सा गवां मातेव पालिका वेद्या ॥२॥

पदार्थान्वयभाषाः - (अश्वेव) अश्वावद्वर्त्तमाना (चित्रा) अद्भुतगुणकर्म्मस्वभावा (अरुषी) आरक्ता (माता) जननी (गवाम्) किरणानाम् (ऋतावरी) बहुसत्यप्रकाशिका (सखा) (अभूत्) (अश्विनोः) सूर्य्याचन्द्रमसोः (उषाः) ॥२॥
भावार्थभाषाः - अत्रोपमालङ्कारः । हे मनुष्या ! या मातृवत्सखिवद्वर्त्तमानोषा वर्त्तते सा युक्त्या सर्वैः सेवनीया ॥२॥
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - Like a graceful mare, crimson red, wondrous bright, mother pioneer of sunrays, shower of nature’s light and bliss, the dawn is a friend of the Ashvins, the sun and moon.
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आचार्य धर्मदेव विद्या मार्तण्ड

The same subject of attributes of a noble woman is continued.

अन्वय:

O man! the dawn is wonderful, reddish, manifester of truth; is like a mare, the friend of the sun and the moon. She should be considered as the mother of the rays. (In the same manner, a noble woman should be preceptor of truth, like a sister or the teacher and the preacher and mother of noble speech).

भावार्थभाषाः - O men! the dawn which is like the mother or the friend should be utilized properly.
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माता सविता जोशी

(यह अनुवाद स्वामी दयानन्द सरस्वती जी के आधार पर किया गया है।)
भावार्थभाषाः - या मंत्रात उपमालंकार आहे. हे माणसांनो ! जी उषा माता व मित्र याप्रमाणे असते, तिचे सर्वांनी युक्तीने सेवन करावे. ॥ २ ॥