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ता इन्न्वे॒३॒॑व स॑म॒ना स॑मा॒नीरमी॑तवर्णा उ॒षस॑श्चरन्ति। गूह॑न्ती॒रभ्व॒मसि॑तं॒ रुश॑द्भिः शु॒क्रास्त॒नूभिः॒ शुच॑यो रुचा॒नाः ॥९॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

tā in nv eva samanā samānīr amītavarṇā uṣasaś caranti | gūhantīr abhvam asitaṁ ruśadbhiḥ śukrās tanūbhiḥ śucayo rucānāḥ ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

ताः। इत्। नु। ए॒व। स॒म॒ना। स॒मा॒नीः। अमी॑तऽवर्णाः। उ॒षसः॑। च॒र॒न्ति॒। गूह॑न्तीः। अभ्व॑म्। असि॑तम्। रुश॑त्ऽभिः। शु॒क्राः। त॒नूभिः॑। शुच॑यः। रु॒चा॒नाः ॥९॥

ऋग्वेद » मण्डल:4» सूक्त:51» मन्त्र:9 | अष्टक:3» अध्याय:8» वर्ग:2» मन्त्र:4 | मण्डल:4» अनुवाक:5» मन्त्र:9


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स्वामी दयानन्द सरस्वती

अब स्त्रियों के लिये उपदेशविषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥

पदार्थान्वयभाषाः - हे स्त्रियो ! जो (अमीतवर्णाः) विद्यमान वर्णवाली (समना) तुल्य (समानीः) तुल्यविचारशील (रुशद्भिः) नाश करनेवाले गुणों से (अभ्वम्) बड़े (असितम्) निकृष्ट वर्णवाले अन्धकार को (गूहन्तीः) ढाँपती हुई (तनूभिः) विस्तृत शरीरों से (शुक्राः) कान्तिमती और (शुचयः) पवित्र (रुचानाः) प्रीति करनेवाली (उषसः) प्रभातवेलाओं के सदृश (चरन्ति) चलती हैं (ताः) वे (इत्) ही (नु) शीघ्र (एव) ही जैसे सुख देती हैं, वैसे सब को सुखी करो ॥९॥
भावार्थभाषाः - जो स्त्रियाँ प्रातर्वेला के सदृश दुःख को नाश करनेवाली और सुख को उत्पन्न करनेवाली हों, वे ही आनन्द देनेवाली होवें ॥९॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

शक्तिसम्पन्न, पवित्र व दीप्त ज्ञान

पदार्थान्वयभाषाः - [१] (ता:) = वे (एव) = ही (इत् नु) = निश्चय से अब (समना) = सम्यक् प्राणित करनेवाली (समानी:) = समान रूप से चली आ रही (अमीतवर्णाः) = अहिंसित वर्णवाली-तेजस्वी (उषसः) = उषाएँ (चरन्ति) = गतिवाली होती हैं। [२] (अभ्वम्) = महान् (असितम्) = कृष्णवर्ण-रात्रि के अन्धकार को (रुशद्भिः) = चमकते हुए अपने प्रकाशों से (गूहन्ती:) = अपने अन्दर छिपाती हुई, (तनूभिः शुक्रा:) = अपने शरीरों से [शुक्रम्-वीर्यम्] शक्ति-सम्पन्न, (शुचय:) = पवित्र व (रुचाना:) = दीप्तिवाली हैं। वस्तुतः ये उषाएँ हमें शरीर में [शुक्र] वीर्य सम्पन्न, मन में [शुचि] पवित्र तथा मस्तिष्क में [रुच दीप्तौ] दीप्त ज्ञानवाला बनाती हैं ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ– उषाएँ अन्धकार को दूर करनेवाली हैं। इनमें जागनेवाला पुरुष शक्ति-सम्पन्न, पवित्र व दीप्त ज्ञानवाला बनता है।
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स्वामी दयानन्द सरस्वती

अथ स्त्रीभ्य उपदेशविषयमाह ॥

अन्वय:

हे स्त्रियो ! या अमीतवर्णाः समना समानी रुशद्भिरभ्वमसितं गूहन्तीस्तनूभिः शुक्राः शुचयो रुचाना उषसश्चरन्ति ता इन्न्वेव यथा सुखं प्रयच्छन्ति तथैव सर्वान्त्सुखयत ॥९॥

पदार्थान्वयभाषाः - (ताः) (इत्) एव (नु) सद्यः (एव) (समना) समानाः (समानीः) (अमीतवर्णाः) अहिंसितवर्णाः (उषसः) प्रभातवेला इव (चरन्ति) (गूहन्तीः) संवृण्वत्यः (अभ्वम्) महान्तम् (असितम्) निकृष्टवर्णन्तमः (रुशद्भिः) हिंसकैर्गुणैः (शुक्राः) प्रदीप्ताः (तनूभिः) विस्तृतशरीरैः (शुचयः) पवित्राः (रुचानाः) रुचिकर्य्यः ॥९॥
भावार्थभाषाः - याः स्त्रिय उषर्वद् दुःखध्वंसिका सुखजनित्र्यः स्युस्ता एवाऽऽह्वादिका भवेयुः ॥९॥
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - Thus do the dawns, equal, alike, unobstructed and inviolable, radiate and roam around, covering the vast spatial darkness with light and vesting things with beautiful forms of their own by their catalytic rays of light and blaze, penetrating, pure, purifying, beautiful and edifying.
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आचार्य धर्मदेव विद्या मार्तण्ड

Some teachings for the women are given.

अन्वय:

O women ! like the dawns whose hue has not been obliterated, are all identical of similar form, pure, bright and illumining. Concealing their dark destroying attributes, they proceed at great speed and give happiness to all. In the same manner, you should make all beings happy.

भावार्थभाषाः - Those women only are bestowers of delight who destroy the miseries like the dawns and generate happiness.
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माता सविता जोशी

(यह अनुवाद स्वामी दयानन्द सरस्वती जी के आधार पर किया गया है।)
भावार्थभाषाः - ज्या स्त्रिया उषेप्रमाणे दुःखाचा नाश करणाऱ्या व सुख उत्पन्न करणाऱ्या असतील त्याच आनंद देणाऱ्या असतात. ॥ ९ ॥