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इन्द्रा॒ को वां॑ वरुणा सु॒म्नमा॑प॒ स्तोमो॑ ह॒विष्माँ॑ अ॒मृतो॒ न होता॑। यो वां॑ हृ॒दि क्रतु॑माँ अ॒स्मदु॒क्तः प॒स्पर्श॑दिन्द्रावरुणा॒ नम॑स्वान् ॥१॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

indrā ko vāṁ varuṇā sumnam āpa stomo haviṣmām̐ amṛto na hotā | yo vāṁ hṛdi kratumām̐ asmad uktaḥ pasparśad indrāvaruṇā namasvān ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

इन्द्रा॑। कः। वा॒म्। व॒रु॒णा॒। सु॒म्नम्। आ॒प॒। स्तोमः॑। ह॒विष्मा॑न्। अ॒मृतः॑। न। होता॑। यः। वा॒म्। हृ॒दि। क्रतु॑ऽमान्। अ॒स्मत्। उ॒क्तः। प॒स्पर्श॑त्। इ॒न्द्रा॒व॒रु॒णा॒। नम॑स्वान् ॥१॥

ऋग्वेद » मण्डल:4» सूक्त:41» मन्त्र:1 | अष्टक:3» अध्याय:7» वर्ग:15» मन्त्र:1 | मण्डल:4» अनुवाक:4» मन्त्र:1


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स्वामी दयानन्द सरस्वती

अब ग्यारह ऋचावाले इकतालीसवें सूक्त का आरम्भ है, उसके प्रथम मन्त्र में अध्यापक और उपदेशक के विषय को कहते हैं ॥

पदार्थान्वयभाषाः - हे (इन्द्रा) अत्यन्त ऐश्वर्य्य से युक्त (वरुणा) श्रेष्ठ आचरण करनेवाले अध्यापक और उपदेशक जन ! (वाम्) तुम दोनों से (कः) कौन (स्तोमः) प्रशंसा (सुम्नम्) सुख को (हविष्मान्) बहुत पदार्थों में कारण (अमृतः) नाश से रहित और (होता) दाता जन के (न) सदृश (आप) प्राप्त होवे। हे (इन्द्रावरुणा) प्राण और उदान वायु के सदृश प्रियबली जनो ! (यः) जो (अस्मत्) हम लोगों से (उक्तः) कहा गया (नमस्वान्) बहुत अन्न आदि वा सत्करणों युक्त (क्रतुमान्) बहुत श्रेष्ठ बुद्धिवाला (वाम्) आप दोनों के (हृदि) हृदय में (पस्पर्शत्) स्पर्श करे ॥१॥
भावार्थभाषाः - हे अध्यापक और उपदेशको ! जो दाता जन के सदृश पुरुषार्थी, बुद्धिमान्, नम्र, शान्त, सत्कार करनेवाले और माता-पिता से उत्तम प्रकार शिक्षित होवें, उनको पढ़ा और उपदेश देकर लक्ष्मीयुक्त और श्रेष्ठ करो ॥१॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

'नमस्वान्-क्रतुमान्' स्तोम

पदार्थान्वयभाषाः - [१] 'इन्द्र' परमैश्वर्यशाली है [इदि परमैश्वर्ये] । 'वरुण' सब बुराइयों का निवारण करनेवाला है। सब बुराइयों के निवारण से ही परमैश्वर्य की प्राप्ति होती है। इन्हें संबोधन करते हुए कहते हैं कि (इन्द्रावरुणा) = हे इन्द्र और वरुण देवो! (कः) = कौन (वाम्) = आपके (सुम्नम्) = आनन्द को आप प्राप्त करता है ? संसार के विषयों में न फँसनेवाला कोई विरल व्यक्ति ही इन्द्र व वरुण के आनन्द को प्राप्त कर पाता है। वह इस आनन्द को प्राप्त करता है, (यः) = जो कि (स्तोमः) = [स्तोमः अस्य अस्ति इति] स्तुतिवाला बनता है, (हविष्मान्) = त्यागपूर्वक अदन [भक्षण] वाला होता है। (अमृतः न) = अमृत-सा, सदा नीरोग-सा बनता है अथवा विषयवासनाओं के पीछे मरता नहीं। (होता) = यज्ञशील होता है । [२] हे (इन्द्रावरुणा) = इन्द्र और वरुण देवो! (यः) = जो (अस्मदुक्तः) = हमारे से उच्चरित हुआ हुआ (वां हृदि) = आपके हृदय में (पस्पर्शत्) = स्पर्श करे, वही स्तवन ठीक है। यही स्तवन हमें इन्द्र और वरुण के सुख को प्राप्त करानेवाला होता है। यह (स्तोम क्रतुमान्) = यज्ञादि उत्तम कर्मोंवाला है और (नमस्वान्) = नम्रता से युक्त है। वस्तुतः जब हम नम्र व यज्ञशील बनकर प्रभु का स्तवन करते हैं, तभी हम प्रभु के प्रिय होते हैं।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- हम नम्र व यज्ञशील बनकर प्रभु का स्तवन करें। यही स्तवन हमें प्रभु का प्रिय बनाएगा और हम प्रभु के आनन्द में भागी हो सकेंगे।
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स्वामी दयानन्द सरस्वती

अथाध्यापकोपदेशकविषयमाह ॥

अन्वय:

हे इन्द्रावरुणाऽध्यापकोपदेशकौ ! वां कः स्तोमः सुम्नं हविष्मानमृतो होता नाप। हे इन्द्रावरुणा ! योऽस्मदुक्तो नमस्वान् क्रतुमान् वां हृदि पस्पर्शत् ॥१॥

पदार्थान्वयभाषाः - (इन्द्रा) परमैश्वर्य्ययुक्त (कः) (वाम्) युवाभ्याम् (वरुणा) श्रेष्ठाचारिन् (सुम्नम्) सुखम् (आप) प्राप्नुयात् (स्तोमः) प्रशंसा (हविष्मान्) बहुपदार्थहेतुः (अमृतः) नाशरहितः (न) इव (होता) दाता (यः) (वाम्) युवयोः (हृदि) (क्रतुमान्) बहुशुभप्रज्ञः (अस्मत्) (उक्तः) कथितः (पस्पर्शत्) (इन्द्रावरुणा) प्राणोदानवत् प्रियबलिनौ (नमस्वान्) बहूनि नमांस्यन्नादीनि सत्करणानि वा विद्यन्ते यस्य सः ॥१॥
भावार्थभाषाः - हे अध्यापकोपदेशका ! ये होतृवत्पुरुषार्थिनो धीमन्तो नम्राः शान्ताः सत्कारिणो मातापितृभिः सुशिक्षिताः स्युस्तानध्याप्योपदिश्य श्रीमतः श्रेष्ठान् सम्पादयत ॥१॥
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - Indra, O lord of power and glory, O Varuna, lord of justice and rectitude, who could win the favour of your blessing, which song of praise and prayer, expressive of yajnic reverence like an immortal yajaka would win your favour? Which song and tribute, O Indra and Varuna, sung in your honour, expressing humility and surrender as holy offering would touch your heart?
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आचार्य धर्मदेव विद्या मार्तण्ड

The duties of the teachers and preachers are told.

अन्वय:

O teachers and preachers ! you are endowed with great wealth (of wisdom etc.) and with noble character. It is your praise and quality that leads to happiness like a donor, owner of substantial materials and immortal (on account of his good reputation ). O teachers and preachers ! who are endearing and mighty like the Prana and Udana ? should teach the one who is humble or possessor of good food grains, and is very intelligent. Such a man is taught by us and touches your heart (impresses) because of his virtues.

भावार्थभाषाः - O teachers and preachers ! teach and preach to those persons who are industrious like the performers of the Yajnas, and donors. They should be intelligent, humble, quiet, respecters of the enlightened persons and well disciplined by their parents who make them virtuous and wealthy.
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माता सविता जोशी

(यह अनुवाद स्वामी दयानन्द सरस्वती जी के आधार पर किया गया है।)

या सूक्तात अध्यापक, उपदेशक, राजा, प्रजा व मंत्री यांच्या कृत्याचे वर्णन असल्यामुळे या सूक्ताच्या अर्थाची मागच्या सूक्ताच्या अर्थाबरोबर संगती जाणावी.

भावार्थभाषाः - हे अध्यापक व उपदेशकांनो ! जे दात्याप्रमाणे पुरुषार्थी, बुद्धिमान, नम्र, शांत, सत्कार करणारे, माता व पिता यांच्याकडून सुशिक्षित होतात, त्यांना शिकवून व उपदेश करून श्रीमंत व श्रेष्ठ करा. ॥ १ ॥