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इ॒दाह्नः॑ पी॒तिमु॒त वो॒ मदं॑ धु॒र्न ऋ॒ते श्रा॒न्तस्य॑ स॒ख्याय॑ दे॒वाः। ते नू॒नम॒स्मे ऋ॑भवो॒ वसू॑नि तृ॒तीये॑ अ॒स्मिन्त्सव॑ने दधात ॥११॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

idāhnaḥ pītim uta vo madaṁ dhur na ṛte śrāntasya sakhyāya devāḥ | te nūnam asme ṛbhavo vasūni tṛtīye asmin savane dadhāta ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

इ॒दा। अह्नः॑। पी॒तिम्। उ॒त। वः॒। मद॑म्। धुः॒। न। ऋ॒ते। श्रा॒न्तस्य॑। स॒ख्याय॑। दे॒वाः। ते। नू॒नम्। अ॒स्मे। इति॑। ऋ॒भ॒वः॒। वसू॑नि। तृ॒तीये॑। अ॒स्मिन्। सव॑ने। द॒धा॒त॒ ॥११॥

ऋग्वेद » मण्डल:4» सूक्त:33» मन्त्र:11 | अष्टक:3» अध्याय:7» वर्ग:2» मन्त्र:6 | मण्डल:4» अनुवाक:4» मन्त्र:11


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स्वामी दयानन्द सरस्वती

फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥

पदार्थान्वयभाषाः - हे (ऋभवः) बुद्धिमानो ! जो (देवाः) विद्वान् जन (वः) आप लोगों में से (अह्नः) दिन के मध्य में (पीतिम्) पान को (उत) और आप लोगों के (मदम्) आनन्द को (धुः) धारण करें (ते) वे (इदा) इस समय (श्रान्तस्य) तप से नष्ट हुआ है पाप जिसका उसकी सेवा के (ऋते) विना (सख्याय) मित्रपने के लिये (न) नहीं समर्थ होते हैं वे (अस्मिन्) इस (तृतीये) अन्त्य (सवने) श्रेष्ठ कर्म के निमित्त (अस्मे) हम लोगों में (वसूनि) धनों को (नूनम्) निश्चय युक्त (दधात) धारण करो ॥११॥
भावार्थभाषाः - जो जन वर्त्तमान समय में यथार्थ पुरुषार्थ को करते हैं, वे धनपति होते हैं और जो विद्वानों के सङ्ग को नहीं करते हैं, वे धन से रहित हुए दारिद्र्य को भजते हैं ॥११॥ इस सूक्त में विद्वान् माता पिता और मनुष्यों के गुण वर्णन करने से इस सूक्त के अर्थ की पिछिले सूक्त के अर्थ के साथ सङ्गति है, यह जानना चाहिये ॥११॥ यह तेतीसवाँ सूक्त और द्वितीय वर्ग समाप्त हुआ ॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

'न ऋते श्रान्तस्य संख्याय देवाः '

पदार्थान्वयभाषाः - [१] (इदा) = अब सब देव तुम्हारे लिए (अह्नः) = [अ हन्] न नष्ट करने योग्य इस सोम के (पीतिम्) = पान को, (उत) = और (मदम्) = सोमपान जनित हर्ष को (वः) = तुम्हारे लिए (धुः) = धारण करें। (देवाः) = देव (ऋते श्रान्तस्य) = श्रम करनेवाले के अतिरिक्त किसी से (सख्याय न) = मित्रता के लिए नहीं होते सब देव श्रमशील के ही मित्र होते हैं। इसलिए 'ऋभु' श्रमशील बनकर देवों की मैत्री को प्राप्त करते हैं। आसुर भावों से अनाक्रान्त होने के कारण ही वे सोमरक्षण द्वारा जीवन को उल्लासमय बना पाते हैं । [२] प्रभु इन ऋभुओं से कहते हैं कि (ते ऋभवः) = ऋभुओ ! तुम (नूनम्) = निश्चय से (अस्मे) = हमारे वसूनि वसुओं को निवास को उत्तम बनानेवाले तत्त्वों को (अस्मिन् तृतीये सवने) = जीवन के इस तीसरे सवन में अड़सठ से एक सौ सोलह वर्ष तक के इस सायन्तन सवन में भी दधात धारण करो। वस्तुतः जीवन का वास्तविक उत्थान व आनन्द सोमरक्षण पर ही निर्भर करता है। सोमरक्षण के लिए वासनाओं से अनाक्रान्ति आवश्यक है। इसके लिये सदा कर्म में लगे रहना आवश्यक है।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- ऋभु सदा कर्म में लगे रहकर दिव्यगुणों का वर्धन करते हैं। सोमरक्षण द्वारा जीवन के सायंकाल में भी शक्ति सम्पन्न बने रहते हैं। इन्हीं ऋभुओं का ही वर्णन अगले सूक्त में भी है
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स्वामी दयानन्द सरस्वती

पुनस्तमेव विषयमाह ॥

अन्वय:

हे ऋभवो ! ये देवा वो युष्माकमह्नः पीतिमुत वो मदं धुस्त इदा श्रान्तस्य सेवया ऋते सख्याय न प्रभवन्ति तेऽस्मिँस्तृतीये सवनेऽस्मे नूनं दधात ॥११॥

पदार्थान्वयभाषाः - (इदा) इदानीम् (अह्नः) दिनस्य मध्ये (पीतिम्) पानम् (उत) अपि (वः) युष्माकम् (मदम्) आनन्दम् (धुः) दध्युः (न) (ऋते) विना (श्रान्तस्य) तपसा हतकिल्विषस्य (सख्याय) मित्रभावाय (देवाः) विद्वांसः (ते) (नूनम्) निश्चितम् (अस्मे) अस्मासु (ऋभवः) मेधाविनः (वसूनि) धनानि (तृतीये) अन्त्ये (अस्मिन्) (सवने) सत्कर्मणि (दधात) ॥११॥
भावार्थभाषाः - ये वर्त्तमाने समये यथार्थं पुरुषार्थं कुर्वन्ति ते धनपतयो भवन्ति ये च विद्वत्सङ्गं न कुर्वन्ति ते धनहीनाः सन्तो दारिद्र्यं भजन्ते ॥११॥ अत्र विद्वन्मातापितृमनुष्यगुणवर्णनादेतदर्थस्य पूर्वसूक्तार्थेन सह सङ्गतिरस्तीति वेद्यम् ॥११॥ इति त्रयस्त्रिंशत्तमं सूक्तं द्वितीयो वर्गश्च समाप्तः ॥
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - O Rbhus, noble creators and makers, today the holy men bring you soma to celebrate and enjoy. The divines favour not the slothfuls, they extend no hand of friendship unless you are tested in the crucibles of hard work and self sacrifice. May the Rbhus bring us, in truth, the wealths of life in the third session of yajna.
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आचार्य धर्मदेव विद्या मार्तण्ड

The attributes of learned persons are stated.

अन्वय:

O intelligent persons ! let you understand that the learned persons provide you delight in the mid-day with an ideal drink. They are capable to accomplish this with the friendliness of those persons who have annihilated the sins with their austere steps. We urge you to hold riches for our sake, so that we render it for a noble and final cause.

भावार्थभाषाः - Those who act vigorously at the present time, they become rich. And those who do not enjoy the association of learned persons, they become deprived of richness and always live as paupers.
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माता सविता जोशी

(यह अनुवाद स्वामी दयानन्द सरस्वती जी के आधार पर किया गया है।)
भावार्थभाषाः - जे लोक वर्तमानकाळी योग्य पुरुषार्थ करतात, ते श्रीमंत होतात व जे विद्वानांचा संग करीत नाहीत ते धनरहित बनून दारिद्र्य भोगतात. ॥ ११ ॥