क॒नी॒न॒केव॑ विद्र॒धे नवे॑ द्रुप॒दे अ॑र्भ॒के। ब॒भ्रू यामे॑षु शोभेते ॥२३॥
kanīnakeva vidradhe nave drupade arbhake | babhrū yāmeṣu śobhete ||
क॒नी॒न॒काऽइ॑व। वि॒द्र॒धे। नवे॑। द्रु॒ऽप॒दे। अ॒र्भ॒के। ब॒भ्रू इति॑। यामे॑षु। शो॒भे॒ते॒ इति॑ ॥२३॥
स्वामी दयानन्द सरस्वती
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥
हरिशरण सिद्धान्तालंकार
इन्द्रियाश्व ?
स्वामी दयानन्द सरस्वती
पुनस्तमेव विषयमाह ॥
हे विद्वांसौ ! भवन्तौ यौ बभ्रू यामेषु कनीनकेव नवे विद्रधे द्रुपदे अर्भके शोभेते ताविव जगदुपकारकौ भवितुमर्हतः ॥२३॥
डॉ. तुलसी राम
आचार्य धर्मदेव विद्या मार्तण्ड
The theme of teacher and preacher is further developed in the mantra.
O teacher and preacher! all the time you shine like new and handsome substances like in the plants and babes. Both of these look fresh and exceptionally strong. Let us become benefactor like them.
