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ता ते॑ गृणन्ति वे॒धसो॒ यानि॑ च॒कर्थ॒ पौंस्या॑। सु॒तेष्वि॑न्द्र गिर्वणः ॥११॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

tā te gṛṇanti vedhaso yāni cakartha pauṁsyā | suteṣv indra girvaṇaḥ ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

ता। ते॒। गृ॒ण॒न्ति॒। वे॒धसः॑। यानि॒। च॒कर्थ॑। पौंस्या॑। सु॒तेषु॑। इ॒न्द्र॒। गि॒र्व॒णः॒ ॥११॥

ऋग्वेद » मण्डल:4» सूक्त:32» मन्त्र:11 | अष्टक:3» अध्याय:6» वर्ग:29» मन्त्र:1 | मण्डल:4» अनुवाक:3» मन्त्र:11


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स्वामी दयानन्द सरस्वती

फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥

पदार्थान्वयभाषाः - हे (गिर्वणः) वाणियों से स्तुति किये गये (इन्द्र) राजन् ! (यानि) जो (वेधसः) बुद्धिमान् (ते) आपके (पौंस्या) पुरुषों के लिये हितकारक बलों को (गृणन्ति) कहते हैं और जिनको आप (सुतेषु) उत्पन्न पदार्थों में (चकर्थ) करते हो (ता) उनकी हम लोग प्रशंसा करें ॥११॥
भावार्थभाषाः - वे ही प्रशंसा करने योग्य कर्म्म होते हैं कि जिनकी यथार्थवक्ता जन प्रशंसा करें ॥११॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

पौंस्य कर्म

पदार्थान्वयभाषाः - [१] हे (इन्द्र) = शत्रुओं का विद्रावण करनेवाले ! (गिर्वणः) = ज्ञानवाणियों द्वारा उपासनीय प्रभो सुतेषु सोम का [वीर्यशक्ति का] सम्पादन करने पर (यानि) = जिन (पौंस्या) = शक्तिशाली कर्मों को (चकर्थ) = आप करते हैं । (वेधसः) = ज्ञानी पुरुष ते आपके ताउन शक्तिशाली कर्मों को (गृणन्ति) = स्तुतिरूपेण कहते हैं । [२] जब हम शरीर में सोम का सम्पादन करते हैं- वीर्य का उत्पादन व रक्षण करते हैं, तो प्रभु की व्यवस्था के अनुसार न केवल रोग-कृमियों का ही संहार होता है, अपितु वासनाओं का विनाश होकर मन भी पवित्र हो जाता है। उस समय हम स्वभावतः प्रभु का स्तवन कर उठते हैं कि कितनी ही अद्भुत उस प्रभु द्वारा होनेवाली रचना व व्यवस्था है ?
भावार्थभाषाः - भावार्थ- ज्ञानीपुरुष प्रभु से किये जानेवाले शक्तिशाली कर्मों का स्तवन करते हैं और अपने अन्दर सोम की अद्भुत महिमा को देखते हैं।
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स्वामी दयानन्द सरस्वती

पुनस्तमेव विषयमाह ॥

अन्वय:

हे गिर्वण इन्द्र ! यानि वेधसस्ते पौंस्या गृणन्ति यानि त्वं सुतेषु चकर्थ ता वयं प्रशंसेम ॥११॥

पदार्थान्वयभाषाः - (ता) तानि (ते) तव (गृणन्ति) (वेधसः) मेधाविनः (यानि) (चकर्थ) करोषि (पौंस्या) पुंभ्यो हितानि बलानि (सुतेषु) निष्पन्नेषु पदार्थेषु (इन्द्र) राजन् (गिर्वणः) गीर्भिः स्तुत ॥११॥
भावार्थभाषाः - तान्येव प्रशंसनीयानि कर्माणि भवन्ति यान्याप्ताः प्रशंसेयुः ॥११॥
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - Indra, lord of victorious might, in those lands which you awakened into the joy of freedom, the celebrants, men of knowledge and wisdom all, sing in praise of you and celebrate those valorous deeds of yours which you performed in there as for your children.
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आचार्य धर्मदेव विद्या मार्तण्ड

The attributes of teachers and preachers are elucidated.

अन्वय:

O ruler ! who soever admire your heroic strength in their speech and language, you assign them into gainful tasks. Let us also admire such persons.

भावार्थभाषाः - Only such people are worth admiring, who are admired by impartial and straightforward persons.
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माता सविता जोशी

(यह अनुवाद स्वामी दयानन्द सरस्वती जी के आधार पर किया गया है।)
भावार्थभाषाः - ज्याची विद्वान लोकांकडून प्रशंसा होते तेच कर्म प्रशंसनीय मानण्यायोग्य असते. ॥ ११ ॥