आ तू न॑ इन्द्र वृत्रहन्न॒स्माक॑म॒र्धमा ग॑हि। म॒हान्म॒हीभि॑रू॒तिभिः॑ ॥१॥
ā tū na indra vṛtrahann asmākam ardham ā gahi | mahān mahībhir ūtibhiḥ ||
आ। तु। नः॒। इ॒न्द्र॒। वृ॒त्र॒ऽह॒न्। अ॒स्माक॑म्। अ॒र्धम्। आ। ग॒हि॒। म॒हान्। म॒हीभिः॑। ऊ॒तिऽभिः॑ ॥१॥
स्वामी दयानन्द सरस्वती
अब चौबीस ऋचावाले बत्तीसवें सूक्त का आरम्भ है, उसके प्रथम मन्त्र में इन्द्रपदवाच्य राजप्रजागुणों को कहते हैं ॥
हरिशरण सिद्धान्तालंकार
वृत्रहा प्रभु का सान्निध्य
स्वामी दयानन्द सरस्वती
अथेन्द्रपदवाच्यराजप्रजागुणानाह ॥
हे वृत्रहन्निन्द्र ! त्वमस्माकमर्द्धमागहि महीभिरूतिभिस्सह महान् सन्नोऽस्माँस्त्वागहि ॥१॥
डॉ. तुलसी राम
आचार्य धर्मदेव विद्या मार्तण्ड
The salient qualities of a ruler and his subjects are narrated under the nomenclature of Indra.
O ruler! you are Indra, that is greatly prosperous and are comparable with sun, smashing the clouds. We seek your blessings for our progress. Grown under your protective faculties, you come to us.
माता सविता जोशी
(यह अनुवाद स्वामी दयानन्द सरस्वती जी के आधार पर किया गया है।)या सूक्तात इंद्र, राजा, प्रजा, अध्यापक व उपदेशकांच्या गुणांचे वर्णन असल्यामुळे या सूक्ताच्या अर्थाची पूर्व सूक्तार्थाबरोबर संगती जाणली पाहिजे.
