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उ॒त स्मा॑ स॒द्य इत्परि॑ शशमा॒नाय॑ सुन्व॒ते। पु॒रू चि॑न्मंहसे॒ वसु॑ ॥८॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

uta smā sadya it pari śaśamānāya sunvate | purū cin maṁhase vasu ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

उ॒त। स्म॒। स॒द्यः। इत्। परि। श॒श॒मा॒नाय॑। सु॒न्व॒ते। पु॒रु। चि॒त्। मं॒ह॒से॒। वसु॑ ॥८॥

ऋग्वेद » मण्डल:4» सूक्त:31» मन्त्र:8 | अष्टक:3» अध्याय:6» वर्ग:25» मन्त्र:3 | मण्डल:4» अनुवाक:3» मन्त्र:8


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स्वामी दयानन्द सरस्वती

फिर न्यायपालन राजप्रजाधर्मविषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥

पदार्थान्वयभाषाः - हे विद्वन् ! जिससे कि आप (शशमानाय) प्रशंसित और (सुन्वते) पुरुषार्थ से ओषधियों के रस को उत्पन्न करते हुए के लिये (चित्) भी (पुरू) बहुत (वसु) धन को (परि) सब प्रकार (मंहसे) बढ़वाते हो इससे आप (सद्यः) शीघ्र (उत) फिर (स्म) ही (इत्) निश्चित ऐश्वर्य्य को प्राप्त होते हो ॥८॥
भावार्थभाषाः - जो मनुष्य यथार्थवक्ता पुरुषों का सत्कार करते हैं, वे शीघ्र गुणवान् होकर ऐश्वर्य्य से युक्त होवें ॥८॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

शशमान+सुन्वन्

पदार्थान्वयभाषाः - [१] (उत) = और हे प्रभो! आप (सद्यः इत्) = शीघ्र ही (पुरूचित्) = अत्यन्त (वसु) = धन (परि मंहसे) = सब ओर से देते ही हैं। प्रभु सब वसुओं के स्वामी हैं, 'वसूनां वसुपति' वे प्रभु हैं। उनसे दिये जानेवाले वसुओं में किसी प्रकार की कमी सम्भव ही नहीं। [२] हम उन वसुओं की प्राप्ति का अपने को पात्र बनाएँ। (शशमानाय) = [शंसमानाय] स्तवन करनेवाले के लिए प्रभु इन वसुओं को प्राप्त कराते हैं। (सुन्वते) = सोम का अभिषव करनेवाले के लिए प्रभु के ये वसु प्राप्त होते हैं हम 'शशमान व सुन्वन्' बनकर प्रभु से सब वसुओं को प्राप्त करें। सदा प्रभु का शंसन करें और शरीर में सोम का संपादन करें। सोम का रक्षण करते हुए ही तो हम अपने अन्दर ज्ञान का प्रकाश प्राप्त करेंगे ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ– 'शशमान व सुन्वन्' बनकर हम प्रभु से दिये जानेवाले वसुओं के पात्र हों।
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स्वामी दयानन्द सरस्वती

पुनर्न्यायपालनराजप्रजाधर्मविषयमाह ॥

अन्वय:

हे विद्वन् ! यतस्त्वं शशमानाय सुन्वते चित् पुरू वसु परि मंहसे तस्मात्त्वं सद्य उत स्मेदैश्वर्य्यं प्राप्नोति ॥८॥

पदार्थान्वयभाषाः - (उत) अपि (स्मा) एव (सद्यः) (इत्) (परि) सर्वतः (शशमानाय) प्रशंसिताय (सुन्वते) पुरुषार्थेनाभिषवं कुर्वते (पुरू) बहु। अत्र संहितायामिति दीर्घः। (चित्) अपि (मंहसे) वर्धयसि (वसु) धनम् ॥८॥
भावार्थभाषाः - ये मनुष्या आप्तानां सत्कारं कुर्वन्ति ते तूर्णं गुणवन्तो भूत्वैश्वर्य्ययुक्ता भवेयुः ॥८॥
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - Indra, lord of knowledge and power, you give immense wealth for the celebrant devotee and creator of soma instantly, and ever more augment it many ways all round.
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आचार्य धर्मदेव विद्या मार्तण्ड

The ruler is told to deliver proper and quick justice.

अन्वय:

O learned people! with your strenuous right efforts, you prepare rejuvenating juices of medicinal herbs. Thus you create larger areas of fiscal activities. Consequent upon this you become positively prosperous very soon.

भावार्थभाषाः - The people (or ruler) who honor the State forward and plain speaking persons, they become virtuous very soon and become full of prosperity.
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माता सविता जोशी

(यह अनुवाद स्वामी दयानन्द सरस्वती जी के आधार पर किया गया है।)
भावार्थभाषाः - जी माणसे विद्वान पुरुषांचा सत्कार करतात ती ताबडतोब गुणवान बनून ऐश्वर्याने युक्त होतात. ॥ ८ ॥