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उ॒त स्मा॒ हि त्वामा॒हुरिन्म॒घवा॑नं शचीपते। दाता॑र॒मवि॑दीधयुम् ॥७॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

uta smā hi tvām āhur in maghavānaṁ śacīpate | dātāram avidīdhayum ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

उ॒त। स्म॒। हि। त्वाम्। आ॒हुः। इत्। म॒घऽवा॑नम्। श॒ची॒ऽप॒ते॒। दाता॑रम्। अवि॑ऽदीधयुम् ॥७॥

ऋग्वेद » मण्डल:4» सूक्त:31» मन्त्र:7 | अष्टक:3» अध्याय:6» वर्ग:25» मन्त्र:2 | मण्डल:4» अनुवाक:3» मन्त्र:7


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स्वामी दयानन्द सरस्वती

फिर प्रतिज्ञा पालनेवाले राजप्रजाधर्मविषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥

पदार्थान्वयभाषाः - हे (शचीपते) वाणी और बुद्धि के पालन करनेवाले राजन् ! (हि) जिससे (त्वाम्) आपको (मघवानम्) अत्यन्त श्रेष्ठ बहुत धनवाले (अविदीधयुम्) जुआ आदि दुष्ट कर्म्मों से रहित (दातारम्) देनेवाला (स्म) ही विद्वान् लोग (आहुः) कहते हैं (उत) और सेवा भी करें, इससे (इत्) उन्हीं को हम लोग भी सेवें ॥७॥
भावार्थभाषाः - हे विद्वानो ! जो आप लोग धर्म्मयुक्त कर्म्मों का आचरण करें तो आप लोगों में ऐश्वर्य्य और दानकर्म्म कभी न नष्ट होवें ॥७॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

मघवा, दाता व दीधयु

पदार्थान्वयभाषाः - [१] हे (शचीपते) = सब कर्मों व प्रज्ञानों के स्वामिन् प्रभो ! (उत) = और (त्वां हि) = आपको ही (इत्) = निश्चय से (आहु स्म) = कहते हैं कि (मघवानम्) = आप ज्ञानैश्वर्यवाले हैं। सब ऐश्वर्यों के स्वामी आप ही हैं। (दातारम्) = सब धनों व वसुओं के आप ही देनेवाले हैं। (अविदीधयुम्) = आप कभी न दीप्यमान हों, सो नहीं है, अर्थात् आप सदा दीप्यमान हैं। [२] आपकी उपासना करता हुआ मैं भी ऐश्वर्यशाली बनूँ, दाता बनूँ और सदा दीप्त जीवनवाला होऊँ । ऐश्वर्यशाली होकर अकस्मात् उस ऐश्वर्य का संग्रही [न कि दाता] बनकर मैं ज्ञान दीप्ति को विनष्ट कर बैठता हूँ। भावार्थ- मैं प्रभु को 'मघवा, दाता व दीधयु' शब्दों से स्मरण करता हुआ ऐश्वर्यशाली
भावार्थभाषाः - [वैश्य] बनूँ, देनेवाला [क्षत्रिय] होऊँ और इस प्रकार ज्ञानदीप्त [ब्राह्मण] बन पाऊँ । यह धन मेरे ज्ञान पर परदे के रूप में न हो जाए।
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स्वामी दयानन्द सरस्वती

पुनः प्रतिज्ञापालकराजप्रजाधर्मविषयमाह ॥

अन्वय:

हे शचीपते राजन् ! हि त्वां मघवानमविदीधयुं दातारं स्म विद्वांस आहुरुतापि सेवेरनतस्तमिदेव वयमपि सेवेमहि ॥७॥

पदार्थान्वयभाषाः - (उत) अपि (स्मा) एव। अत्र निपातस्य चेति दीर्घः। (हि) यतः (त्वाम्) (आहुः) कथयन्ति (इत्) एव (मघवानम्) परमपूजितबहुधनम् (शचीपते) वाचः प्रज्ञायाः पालक (दातारम्) (अविदीधयुम्) द्यूतादिदुष्टकर्म्मरहितम् ॥७॥
भावार्थभाषाः - हे विद्वांसो ! यदि यूयं धर्म्याणि कर्माण्याचरत तर्हि युष्मास्वैश्वर्यं दातृत्वं च कदाचिन्न हीयेत ॥७॥
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - O lord of beauty and grace, power, intelligence and will, sages of vision and devotion celebrate you as lord of infinite honour and excellence in existence, boundless giver and self-refulgent beyond imagination.
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आचार्य धर्मदेव विद्या मार्तण्ड

A ruler is told to be sincere to his subjects.

अन्वय:

O ruler ! you are master of ideal speech and wisdom. The scholars and people of right conduct call you the master of great wealth. They have observed you free from gambling and a philanthropist, who serves and looks after their cause and welfare. Let us also follow the similar path.

भावार्थभाषाः - Ọ scholars and learned people! when you ever observe the right conduct in performing righteous actions, you are, bound to grow in prosperity, and the common people will never forget to give away contribution for your maintenance.
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माता सविता जोशी

(यह अनुवाद स्वामी दयानन्द सरस्वती जी के आधार पर किया गया है।)
भावार्थभाषाः - हे विद्वानांनो, जर तुम्ही धर्मयुक्त कर्माचे आचरण केले, तर तुमचे ऐश्वर्य व दातृत्व कधी नष्ट होणार नाही. ॥ ७ ॥