वांछित मन्त्र चुनें
443 बार पढ़ा गया

अ॒भी न॒ आ व॑वृत्स्व च॒क्रं न वृ॒त्तमर्व॑तः। नि॒युद्भि॑श्चर्षणी॒नाम् ॥४॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

abhī na ā vavṛtsva cakraṁ na vṛttam arvataḥ | niyudbhiś carṣaṇīnām ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

अ॒भि। नः॒। आ। व॒वृ॒त्स्व॒। च॒क्रम्। न। वृ॒त्तम्। अर्व॑तः। नि॒युत्ऽभिः॑। च॒र्ष॒णी॒नाम् ॥४॥

443 बार पढ़ा गया
ऋग्वेद » मण्डल:4» सूक्त:31» मन्त्र:4 | अष्टक:3» अध्याय:6» वर्ग:24» मन्त्र:4 | मण्डल:4» अनुवाक:3» मन्त्र:4


स्वामी दयानन्द सरस्वती

फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥

पदार्थान्वयभाषाः - हे राजन् ! आप (नः) हम लोगों को (वृत्तम्) सब प्रकार से दृढ़ (चक्रम्) चक्र के (न) सदृश श्रेष्ठ कर्म्मों में (अभि, आ, ववृत्स्व) सब ओर से अच्छे प्रकार वर्त्ताइये (नियुद्भिः) और वायु के गमनों के सदृश वेगों के साथ (चर्षणीनाम्) मनुष्यों के (अर्वतः) घोड़ों को वर्त्ताईये ॥४॥
भावार्थभाषाः - हे राजन् ! आप सत्य न्याय में वर्त्ताव करके हम लोगों का भी उसी के अनुसार वर्त्ताव कराइये ॥४॥

हरिशरण सिद्धान्तालंकार

उत्तम इन्द्रियाश्वों की प्राप्ति

पदार्थान्वयभाषाः - [१] हे प्रभो ! (अर्वतः) = वासनाओं का संहार करनेवाले [अर्व् to kill] (नः) = हमें (अभि आववृत्स्व) = आप आभिमुख्येन प्राप्त होइये । वासनाओं का संहार करके हम अपने को आपकी प्राप्ति के योग्य बनाएँ। [२] (चर्षणीनाम्) = श्रमशील मनुष्यों के (नियुद्भिः) = शरीर-रथ में जुतनेवाले इन इन्द्रियाश्वों के साथ आप हमें उसी प्रकार प्राप्त होइये, (न) = जैसे कि (वृत्तं चक्रम्) = एक वृत्ताकार चक्र को घोड़े प्राप्त होते हैं। प्रभुकृपा से हमें उत्तम इन्द्रियाश्व प्राप्त हों ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- हम वासनाओं के संहार की वृत्तिवाले बनें। हम प्रभुप्राप्ति के लिए यत्नशील हों। प्रभु हमें उत्तम इन्द्रियाश्व प्राप्त कराएँ ।

स्वामी दयानन्द सरस्वती

पुनस्तमेव विषयमाह ॥

अन्वय:

हे राजँस्त्वं नोऽस्मान् वृत्तं चक्रं न सत्कर्मस्वभ्याववृत्स्व नियुद्भिः सह चर्षणीनामर्वतश्चाभ्याववृत्स्व ॥४॥

पदार्थान्वयभाषाः - (अभि) अत्र संहितायामिति दीर्घः। (नः) अस्मान् (आ) (ववृत्स्व) आवर्तय (चक्रम्) (न) इव (वृत्तम्) सर्वतो दृढम् (अर्वतः) अश्वान् (नियुद्भिः) वायुगतिभिरिव वेगैः (चर्षणीनाम्) मनुष्याणाम् ॥४॥
भावार्थभाषाः - हे राजन् ! भवान्सत्ये न्याये वर्तित्वास्मानपि वर्तयतु ॥४॥

डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - Ruler of the world, turn and come to us on the wheels of a chariot in motion. Come lord and help us turn the wheel of the social order at the speed of winds.

आचार्य धर्मदेव विद्या मार्तण्ड

Some requests and expectations from a ruler are narrated.

अन्वय:

O ruler! you bring us around the right path, which is the nucleolus or axle of a chariot of good actions. You make our horses (chariots) fast like blowing winds.

भावार्थभाषाः - O king! as you behave and act with truth and justice, let you teach the same in our behavior.

माता सविता जोशी

(यह अनुवाद स्वामी दयानन्द सरस्वती जी के आधार पर किया गया है।)
भावार्थभाषाः - हे राजा! तू सत्य, न्यायाने वागावेस व आमच्याकडूनही त्यानुसार आचरण करवून घ्यावेस. ॥ ४ ॥