कया॑ नश्चि॒त्र आ भु॑वदू॒ती स॒दावृ॑धः॒ सखा॑। कया॒ शचि॑ष्ठया वृ॒ता ॥१॥
kayā naś citra ā bhuvad ūtī sadāvṛdhaḥ sakhā | kayā śaciṣṭhayā vṛtā ||
कया॑। नः॒। चि॒त्रः। आ। भु॒व॒त्। ऊ॒ती। स॒दाऽवृ॑धः। सखा॑। कया॑। शचि॑ष्ठया। वृ॒ता ॥१॥
स्वामी दयानन्द सरस्वती
अब पन्द्रह ऋचावाले इकतीसवें सूक्त का प्रारम्भ है, उसके प्रथम मन्त्र में राजप्रजाधर्मविषय को कहते हैं ॥
हरिशरण सिद्धान्तालंकार
प्रभु का कल्याणकारक रक्षण
स्वामी दयानन्द सरस्वती
अथ राजप्रजाधर्ममाह ॥
हे राजन् ! सदावृधस्त्वं नः कयोती, कया शचिष्ठया वृता चित्रः सखा आ भुवत् ॥१॥
डॉ. तुलसी राम
आचार्य धर्मदेव विद्या मार्तण्ड
The relations between the ruler and his subjects are described.
O ruler ! extending your kingdom and influence you become friendly to us by dint of your protective actions, nice speech, and actions or intelligence. These qualities bear peculiar virtues, actions and temperament, making you a friend in real senses.
माता सविता जोशी
(यह अनुवाद स्वामी दयानन्द सरस्वती जी के आधार पर किया गया है।)या सूक्तात राजा व प्रजेच्या धर्माचे वर्णन असल्यामुळे या सूक्ताच्या अर्थाची पूर्व सूक्तार्थाबरोबर संगती जाणली पाहिजे.
