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क॒था म॒हाम॑वृध॒त्कस्य॒ होतु॑र्य॒ज्ञं जु॑षा॒णो अ॒भि सोम॒मूधः॑। पिब॑न्नुशा॒नो जु॒षमा॑णो॒ अन्धो॑ वव॒क्ष ऋ॒ष्वः शु॑च॒ते धना॑य ॥१॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

kathā mahām avṛdhat kasya hotur yajñaṁ juṣāṇo abhi somam ūdhaḥ | pibann uśāno juṣamāṇo andho vavakṣa ṛṣvaḥ śucate dhanāya ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

क॒था। म॒हाम्। अ॒वृ॒ध॒त्। कस्य॑। होतुः॑। य॒ज्ञम्। जु॒षा॒णः। अ॒भि। सोम॑म्। ऊधः॑। पिब॑न्। उ॒शा॒नः। जु॒षमा॑णः। अन्धः॑। व॒व॒क्षे। ऋ॒ष्वः। शु॒च॒ते। धना॑य ॥१॥

ऋग्वेद » मण्डल:4» सूक्त:23» मन्त्र:1 | अष्टक:3» अध्याय:6» वर्ग:9» मन्त्र:1 | मण्डल:4» अनुवाक:3» मन्त्र:1


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स्वामी दयानन्द सरस्वती

अब ग्यारह ऋचावाले तेईसवें सूक्त का प्रारम्भ है, उसके प्रथम मन्त्र में प्रश्नोत्तरविषय को कहते हैं ॥

पदार्थान्वयभाषाः - हे विद्वन् ! (कस्य) किस (होतुः) न्याय आदि कर्म्म करनेवाले के (महाम्) बड़े (यज्ञम्) मेल करने योग्य व्यवहार का (जुषाणः) सेवन करता हुआ (कथा) किस प्रकार से (अभि, अवृधत्) बढ़ता और जो (ऊधः) उत्तम (सोमम्) दुग्ध आदि रस को (पिबन्) पीता ऐश्वर्य की (उशानः) कामना करता और (अन्धः) अन्न की (जुषमाणः) सेवा करता हुआ (ववक्षे) पदार्थ पहुँचाता है (ऋष्वः) तथा बड़ा हुआ (धनाय) धन के लिये (शुचते) पवित्र कराता वा विचार कराता है ॥१॥
भावार्थभाषाः - हे विद्वन् ! किससे पढ़कर विद्यार्थी कैसे बढ़े? कैसे विद्या का सेवन करे? और कौन विद्वान् होवे? इस प्रश्न का, ब्रह्मचर्य्य से वीर्य्य का निग्रह करके, विद्या की कामना करता हुआ, आचार्य्य के समीप जा और सेवा करके, नियत आहार-विहार युक्त हुआ, रोगरहित होकर, विद्या की प्राप्ति के लिये अत्यन्त प्रयत्न करता है, यह उत्तर है ॥१॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

पवित्र-अन्न, पवित्र धन

पदार्थान्वयभाषाः - [१] (कस्य होतुः) = किस होता के (यज्ञं जुषाण:) = यज्ञ से प्रीणित होते हुए (कथा) = किस अद्भुत प्रकार से (महाम्) = [मह पूजायाम्] इस पूजा की वृत्तिवाले होता को (अवृधत्) = वे प्रभु बढ़ाते हैं। यह उपासक (सोममभि) = सोमशक्ति का लक्ष्य करके शरीर में सोमोत्पादन के निमित्त (ऊधः) = गौ के ऊधस् से प्राप्य दूध को (पिबन्) = पीता है और (उशानः) = चाहता हुआ (अन्धः) = सोम्य अन्न का (जुषमाणः) = सेवन करता है। यहाँ दूध के स्थान पर ऊधस् शब्द का प्रयोग इस बात का संकेत करता है कि यह ताजा ही दूध-धारोष्ण दूध पीता है तथा 'उशान: ' शब्द का प्रयोग इस बात का संकेत कर रहा है कि भोजन को यह प्रसन्नतापूर्वक ही खाता है। इससे इसके अन्दर उत्तम सोम आदि धातुओं का निर्माण होता है। प्रभु इस दूध व उत्तम अन्न द्वारा ही इस उपासक का वर्धन करते हैं। [२] (ऋष्वः) = वे महान् प्रभु इस उपासक को (शुचते) = पवित्र मार्गों से कमाये जानेवाले (धनाय) = धन के लिए ही (ववक्षे) = [वहति प्रापयति] ले चलते हैं। इस पवित्र धन द्वारा इसका जीवन पवित्र ही बनता है। जीवन में अवनति का कारण अपवित्र आहार व अपवित्र धन ही होता है। आहार व धन की पवित्रता उसके उत्थान का साधन बनती है। यह व्यक्ति यज्ञ आदि उत्तम कर्मों से प्रभु को प्रीणित करनेवाला बनता है।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- हम धारोष्ण दूध का प्रयोग करें और सात्त्विक अन्न का प्रसन्नतापूर्वक सेवन करें। पवित्र साधनों से धनार्जन करते हुए यज्ञादि उत्तम कर्म करें। यही प्रभु की प्राप्ति करने का मार्ग है।
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स्वामी दयानन्द सरस्वती

अथ प्रश्नोत्तरविषयमाह ॥

अन्वय:

हे विद्वन् ! कस्य होतुर्महां यज्ञं जुषाणः कथाऽभ्यवृधत् य ऊधस्सोमं पिबन्नैश्वर्यमुशानोऽन्धो जुषमाणो ववक्ष ऋष्वस्सन् धनाय शुचते ॥१॥

पदार्थान्वयभाषाः - (कथा) (महाम्) महान्तम् (अवृधत्) वर्धते (कस्य) (होतुः) न्यायादिकर्म्मकर्तुः (यज्ञम्) सङ्गन्तव्यं व्यवहारम् (जुषाणः) सेवमानः (अभि) (सोमम्) दुग्धादिरसम् (ऊधः) उत्कृष्टम् (पिबन्) (उशानः) कामयमानः (जुषमाणः) सेवमानः (अन्धः) अन्नम् (ववक्षे) वहति (ऋष्वः) महान् (शुचते) पवित्रयति विचारयति वा (धनाय) ॥१॥
भावार्थभाषाः - हे विद्वन् ! कस्मादधीत्य विद्यार्थी कथं वर्धेत कथं विद्यां सेवेत कश्च विद्वान् भवेदित्यस्य प्रश्नस्य ब्रह्मचर्य्येण वीर्य्यं निगृह्य विद्यां कामयमान आचार्य्यमुपेत्य सेवां कृत्वा मिताऽऽहारविहारः सन्नरोगोः भूत्वा विद्याप्राप्तये भृशं प्रयतत इत्युत्तरम् ॥१॥
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - How to evolve and exalt the grandeur of life? Which creative yajaka’s holy programme of yajnic instruction and evolution to join? Which milky drink of soma to drink from the mother’s breast? The great, generous and protective lord of sublimity, Indra, commanding knowledge, wealth, honour and excellence, loving and owning up the devoted disciple supplicant, cherishing his offer of homage, blesses him with the gift of refinement and exaltation of his innate wealth of honour and grandeur.
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आचार्य धर्मदेव विद्या मार्तण्ड

Answers to certain questions are solicited.

अन्वय:

O learned person! by accomplishing noble dealings (which is a great Yajna) good and just persons have made you grown. A man taking good milk and desiring prosperity carries on the work. Being great, he purifies and gives due consideration to the proper use of wealth.

भावार्थभाषाः - O learned person! tell me from whom a student should learn and how should he grow? How should he acquire knowledge and become highly learned? These are the questions. The answers to these questions are (1) You should observe Brahmacharya, preserve semen or vital fluid, (2) Should desire the acquisitions of knowledge, (3) Approach an Acharya (preceptor) and should serve him. He should be regular in taking meals and walking etc. and remain free from all diseases and be healthy. Thereafter, he should endeavor much for acquiring true knowledge.
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माता सविता जोशी

(यह अनुवाद स्वामी दयानन्द सरस्वती जी के आधार पर किया गया है।)

या सूक्तात प्रश्नोत्तर, मैत्री, शत्रूंचे निवारण, सेनेचा उत्कर्ष व सत्याचरणाची उत्तमता यांचे वर्णन असल्यामुळे या अर्थाची या पूर्वीच्या सूक्तार्थाबरोबर संगती जाणावी.

भावार्थभाषाः - हे विद्वाना ! विद्यार्थ्याने कुणाकडून शिकावे, कसे वाढावे, कसे विद्येचे सेवन करावे, कुणी विद्वान व्हावे या प्रश्नाचे उत्तर असे की, जो ब्रह्मचर्याने वीर्याचा निग्रह करून विद्येची कामना करीत आचार्याजवळ जाऊन व सेवा करून नियत आहार विहारयुक्त, रोगरहित होऊन विद्येच्या प्राप्तीसाठी प्रयत्न करतो, त्याला हा अधिकार आहे. ॥ १ ॥