भ॒द्रा ते॒ हस्ता॒ सृकृ॑तो॒त पा॒णी प्र॑य॒न्तारा॑ स्तुव॒ते राध॑ इन्द्र। का ते॒ निष॑त्तिः॒ किमु॒ नो म॑मत्सि॒ किं नोदु॑दु हर्षसे॒ दात॒वा उ॑ ॥९॥
bhadrā te hastā sukṛtota pāṇī prayantārā stuvate rādha indra | kā te niṣattiḥ kim u no mamatsi kiṁ nod-ud u harṣase dātavā u ||
भ॒द्रा। ते॒। हस्ता॑। सुऽकृ॑ता। उ॒त। पा॒णी इति॑। प्र॒ऽय॒न्तारा॑। स्तु॒व॒ते। राधः॑। इ॒न्द्र॒। का। ते॒। निऽस॑त्तिः। किम्। ऊ॒म् इति॑। नो इति॑। म॒म॒त्सि॒। किम्। न। उत्ऽउ॑त्। ऊ॒म् इति॑। ह॒र्ष॒से॒। दात॒वै। ऊँ॒ इति॑ ॥९॥
स्वामी दयानन्द सरस्वती
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥
हरिशरण सिद्धान्तालंकार
सब धनों के दाता प्रभु
स्वामी दयानन्द सरस्वती
पुनस्तमेव विषयमाह ॥
हे इन्द्र ! यस्य ते सुकृता हस्ता उतापि प्रयन्तारा भद्रा पाणी स्तुवते राधो दद्यातां तस्य ते का निषत्तिरु त्वं किं नो ममत्सि दातवा उ किं न उ उदुद्धर्षसे ॥९॥
डॉ. तुलसी राम
आचार्य धर्मदेव विद्या मार्तण्ड
The duties of the public servants are elaborated.
O Indra (king) you are bestower of happiness on all. Your hands are auspicious. You do good deeds, and your arms earn wealth for a truth speaking people. What is your position or policy? Why do you not please us? Why are you not delighted to give us gifts ?
