आ या॒त्विन्द्रोऽव॑स॒ उप॑ न इ॒ह स्तु॒तः स॑ध॒माद॑स्तु॒ शूरः॑। वा॒वृ॒धा॒नस्तवि॑षी॒र्यस्य॑ पू॒र्वीर्द्यौर्न क्ष॒त्रम॒भिभू॑ति॒ पुष्या॑त् ॥१॥
ā yātv indro vasa upa na iha stutaḥ sadhamād astu śūraḥ | vāvṛdhānas taviṣīr yasya pūrvīr dyaur na kṣatram abhibhūti puṣyāt ||
आ। या॒तु॒। इन्द्रः॑। अव॑से। उप॑। नः॒। इ॒ह। स्तु॒तः। स॒ध॒ऽमात्। अ॒स्तु॒। शूरः॑। व॒वृ॒धा॒नः। तवि॑षीः। यस्य॑। पू॒र्वीः। द्यौः। न। क्ष॒त्रम्। अ॒भिऽभू॑ति। पुष्या॑त् ॥१॥
स्वामी दयानन्द सरस्वती
अब ग्यारह ऋचावाले इक्कीसवें सूक्त का प्रारम्भ है, उसके प्रथम मन्त्र में इन्द्रपदवाच्य राजगुणों को कहते हैं ॥
हरिशरण सिद्धान्तालंकार
'सधमाद्' प्रभु
स्वामी दयानन्द सरस्वती
अथेन्द्रपदवाच्यराजगुणानाह ॥
हे विद्वांसो ! यस्य राज्ञो द्यौर्न पूर्वीस्तविषीः स्युर्द्यौर्नाऽभिभूति क्षत्रं पुष्यात् स वावृधानः शूरः स्तुत इन्द्रो नोऽस्माकमवस इहोपायात्वस्माभिः सधमादस्तु ॥१॥
डॉ. तुलसी राम
आचार्य धर्मदेव विद्या मार्तण्ड
The attributes of Indra (king) are told.
O learned person 1 may that Indra (king) come to us for protection whose time-tested armies are like the sun. His kingdom overpowers the enemies like the radiant sun. May he come to us being praised, ever growing and destroying his enemies, and be happy with us.
माता सविता जोशी
(यह अनुवाद स्वामी दयानन्द सरस्वती जी के आधार पर किया गया है।)या सूक्तात इंद्र, राजा व प्रजा यांच्या गुणांचे वर्णन असल्यामुळे या सूक्ताच्या अर्थाची मागच्या सूक्ताच्या अर्थाबरोबर संगती जाणावी.
