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अ॒यं पन्था॒ अनु॑वित्तः पुरा॒णो यतो॑ दे॒वा उ॒दजा॑यन्त॒ विश्वे॑। अत॑श्चि॒दा ज॑निषीष्ट॒ प्रवृ॑द्धो॒ मा मा॒तर॑ममु॒या पत्त॑वे कः ॥१॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

ayam panthā anuvittaḥ purāṇo yato devā udajāyanta viśve | ataś cid ā janiṣīṣṭa pravṛddho mā mātaram amuyā pattave kaḥ ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

अ॒यम्। पन्थाः॑। अनु॑ऽवित्तः। पु॒रा॒णः। यतः॑। दे॒वाः। उ॒त्ऽअजा॑यन्त। विश्वे॑। अतः॑। चि॒त्। आ। ज॒नि॒षी॒ष्ट॒। प्रऽवृ॑द्धः। मा। मा॒तर॑म्। अ॒मु॒या। पत्त॑वे। क॒रिति॑ कः ॥१॥

ऋग्वेद » मण्डल:4» सूक्त:18» मन्त्र:1 | अष्टक:3» अध्याय:5» वर्ग:25» मन्त्र:1 | मण्डल:4» अनुवाक:2» मन्त्र:1


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स्वामी दयानन्द सरस्वती

अब तेरह ऋचावाले अठारहवें सूक्त का प्रारम्भ है, उसके प्रथम मन्त्र में उत्तम ऐश्वर्यवान् मनुष्य के लिये अच्छे मार्ग का उपदेश करते हैं ॥

पदार्थान्वयभाषाः - हे मनुष्यो ! (यतः) जिससे (विश्वे) सब (देवाः) विद्वान् लोग (उदजायन्त) उत्तम होते हैं, वह (अयम्) यह (अनुवित्तः) अनुकूल प्राप्त (पुराणः) अनादि काल से सिद्ध (पन्थाः) मार्ग है, जिससे यह संसार (प्रवृद्धः) बढ़ा (जनिषीष्ट) उत्पन्न होवे (अतः) इस कारण से (चित्) भी आप (अमुया) उस उत्पत्ति से (मातरम्) माता को (पत्तवे) प्राप्त होने को (मा) मत (आ, कः) करे ॥१॥
भावार्थभाषाः - हे मनुष्यो ! जिस मार्ग से यथार्थवक्ता पुरुष जावें, उसी मार्ग से आप लोग भी चलो, जो बड़ी वृद्धि भी होवे तो भी माता का अपमान किसी को न करना चाहिये ॥१॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

पुराण धर्ममार्ग

पदार्थान्वयभाषाः - [१] (अयम्) = यह (पन्थाः) = धर्म का मार्ग (अनु-वित्तः) = गुरु-शिष्य परम्परया अनुक्रमेण जाना जाता है। (पुराण:) = यह सनातन है- सदा से चला आ रहा है-सृष्टि के प्रारम्भ में प्रभु ने इसका ज्ञान 'अग्नि, वायु, आदित्य व अंगिरा' इन चार ऋषियों को दिया। उनसे अगले ऋषियों ने प्राप्त किया और यह क्रम से चला आया। यह वह मार्ग है, (यतः) = जिससे (विश्वे देवा:) = सब देव (उद् अजायन्त) = उत्कर्षेण प्रादुर्भूत होते हैं। इस मार्ग पर चलने से दिव्य गुणों का विकास होता है। [२] (अतः) = इसी से (चित्) = निश्चयपूर्वक (आजनिषीष्ट) = मनुष्य विकास को प्राप्त हुआ और (प्रवृद्धः) = प्रकृष्ट बुद्धिवाला हुआ। (अमुया) = इस मार्ग पर चलने द्वारा (मातरम्) = इस वेदमाता को (पत्तवे मा क:) = पतन के लिए मत कर, अर्थात् वेदमाता द्वारा कहे हुए मार्ग का आक्रमण करता हुआ तू पतन से अपने को बचानेवाला हो । तेरे उत्कर्ष में ही वेदमाता का भी उत्कर्ष है। तेरे आचरण में हीनता के आने से वेद की भी निन्दा होगी कि 'वेद पढ़े हुए ऐसे ही होते हैं?'
भावार्थभाषाः - भावार्थ- प्रभु ने वेद द्वारा मार्ग का उपदेश दिया है। उस पर चलकर ही हम अपने विकास व उत्कर्ष को सिद्ध करते हैं ।
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स्वामी दयानन्द सरस्वती

अथेन्द्राय मनुष्याय सन्मार्गोपदेशमाह ॥

अन्वय:

हे मनुष्या ! यतो विश्वे देवा उदजायन्त सोऽयमनुवित्तः पुराणः पन्था अस्ति। यतोऽयं संसारः प्रवृद्धो जनिषीष्टाऽतश्चित्त्वममुया मातरं पत्तवे माऽकः ॥१॥

पदार्थान्वयभाषाः - (अयम्) (पन्थाः) मार्गः (अनुवित्तः) अनुलब्धः (पुराणः) सनातनः (यतः) यस्मात् (देवाः) विद्वांसः (उदजायन्त) उत्कृष्टा भवन्ति (विश्वे) सर्वे (अतः) अस्मात् (चित्) अपि (आ) (जनिषीष्ट) जायेत (प्रवृद्धः) (मा) निषेधे (मातरम्) जननीम् (अमुया) तया (पत्तवे) पत्तुं प्राप्तुम् (कः) कुर्याः ॥१॥
भावार्थभाषाः - हे मनुष्या ! येन मार्गेणाप्ता गच्छेयुस्तेनैव मार्गेण यूयमपि गच्छत। यदि महती वृद्धिरपि स्यात्तदपि माता केनापि नाऽवमन्तव्या ॥१॥
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - This is the path ancient and eternal, known and followed, by which all saints and sages and divine facts and forces are born to grow and rise, from which the whole world comes into being and evolves to greatness and grandeur. Therefore, do not do anything by that way to insult or desecrate the mother, nature, earth, human mother or animal, or any source of generation.
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आचार्य धर्मदेव विद्या मार्तण्ड

The golden path for a wealthy man (Indra) is pointed out.

अन्वय:

O men ! this is the time tested and recognized path by which all learned persons become exalted. All this world can make real progress by treading upon this path. But, however great progress, you may make, never insult your mother in any way.

भावार्थभाषाः - O men! you should also walk that path which is trodden by absolutely truthful learned persons. However, great advancement you may be able to make, never insult your mother.
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माता सविता जोशी

(यह अनुवाद स्वामी दयानन्द सरस्वती जी के आधार पर किया गया है।)

या सूक्तात इंद्र, मेघ, राजा व विद्वान यांच्या कार्याचे वर्णन असल्यामुळे या सूक्ताच्या अर्थाची पूर्व सूक्तार्थाबरोबर संगती जाणावी.

भावार्थभाषाः - हे माणसांनो ! ज्या मार्गाने आप्त (विद्वान) लोक जातात त्याच मार्गाने तुम्हीही चालाल तर महान उन्नती होईल; तरीही माता व पिता यांचा अपमानही कुणी करू नये. ॥ १ ॥