आ वां॒ वहि॑ष्ठा इ॒ह ते व॑हन्तु॒ रथा॒ अश्वा॑स उ॒षसो॒ व्यु॑ष्टौ। इ॒मे हि वां॑ मधु॒पेया॑य॒ सोमा॑ अ॒स्मिन्य॒ज्ञे वृ॑षणा मादयेथाम् ॥४॥
ā vāṁ vahiṣṭhā iha te vahantu rathā aśvāsa uṣaso vyuṣṭau | ime hi vām madhupeyāya somā asmin yajñe vṛṣaṇā mādayethām ||
आ। वा॒म्। वहि॑ष्ठाः। इ॒ह। ते। व॒ह॒न्तु॒। रथाः॑। अश्वा॑सः। उ॒षसः॑। विऽउ॑ष्टौ। इ॒मे। हि। वा॒म्। म॒धु॒ऽपेया॑य। सोमाः॑। अ॒स्मिन्। य॒ज्ञे। वृ॒ष॒णा॒। मा॒द॒ये॒था॒म् ॥४॥
स्वामी दयानन्द सरस्वती
अब स्त्री-पुरुष के गुणों को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥
हरिशरण सिद्धान्तालंकार
[१] हे (अश्विनी) = देवो, प्राणापानो ! (इह) = इस जीवन में (वहिष्ठाः) = लभ्य स्थान की ओर ले जाने में उत्तम (ते रथाः) = वे शरीरस्थ तथा (अश्वासः) = इन्द्रियाश्व (उषसः व्युष्टौ) = उषा के उदित होते ही (वाम्) = आपको (आवहन्तु) = प्राप्त करानेवाले हों। हम उपाकाल में प्रबुद्ध होकर, स्वास्थ्य सम्बन्धी कार्यों से निवृत्त होकर, प्राणसाधना में प्रवृत्त हों। यह प्राणसाधना ही हमें जीवनयात्रा में सफल बनायेगी। [२] हे वृषणा शक्तिशाली प्राणापानो! (इमे) = ये (सोमाः) = सोम (वाम्) = आपके हैं। ये (हि) = निश्चय से (मधुपेयाय) = माधुर्य के पान के लिये हैं। प्राणसाधना के द्वारा शरीर में ही ऊर्ध्वगतिवाले ये सोम जीवन को मधुर बनाते हैं। इसलिए हे प्राणापानो! आप (अस्मिन् यज्ञे) = इस जीवनयज्ञ में (मादयेथाम्) = हर्ष का अनुभव करानेवाले होवो । प्राणसाधना से 'शरीर, मन व बुद्धि' सभी का स्वास्थ्य प्राप्त होता है, परिणामत: एक अद्भुत आनन्द का भी अनुभव होता है।
स्वामी दयानन्द सरस्वती
अथ स्त्रीपुरुषगुणानाह ॥
हे स्त्रीपुरुषौ ! वां ये वहिष्ठा रथा अश्वास उषसो व्युष्टौ सन्ति ते युवामिहाऽऽवहन्तु। य इमे हि वां सोमा अस्मिन् यज्ञे मधुपेयाय भवन्ति तानिह सेवित्वा वृषणा सन्तौ युवां मादयेथाम् ॥४॥
डॉ. तुलसी राम
आचार्य धर्मदेव विद्या मार्तण्ड
The attributes of men and women are stated.
O men and women ! as the sturdy and fast horses (horse-power) carry the transport early morning with great speed and excellently and take you to the destination.. They carry, bath of you to the site of Yajna (non-violent sacrificial act), so that you, both eat and drink the nourishing and sweet stuff (Soma) and enjoy your nuptial life having acquired vitality.
