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सोमो॑ जिगाति गातु॒विद्दे॒वाना॑मेति निष्कृ॒तम्। ऋ॒तस्य॒ योनि॑मा॒सद॑म्॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

somo jigāti gātuvid devānām eti niṣkṛtam | ṛtasya yonim āsadam ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

सोमः॑। जि॒गा॒ति॒। गा॒तु॒ऽवित्। दे॒वाना॑म्। ए॒ति॒। निः॒ऽकृ॒तम्। ऋ॒तस्य॑। योनि॑म्। आ॒ऽसद॑म्॥

ऋग्वेद » मण्डल:3» सूक्त:62» मन्त्र:13 | अष्टक:3» अध्याय:4» वर्ग:11» मन्त्र:3 | मण्डल:3» अनुवाक:5» मन्त्र:13


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स्वामी दयानन्द सरस्वती

फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं।

पदार्थान्वयभाषाः - जो (गातुवित्) प्रशंसा जाननेवाले (सोमः) ऐश्वर्य्य से युक्त (देवानाम्) विद्वानों और (ऋतस्य) सत्य के (निष्कृतम्) निरन्तर जाने गए (आसदम्) और जिसमें सब वर्त्तमान होते हैं उस (योनिम्) कारण की (जिगाति) स्तुति करता है, वह अपेक्षित सुख को (एति) प्राप्त होता है ॥१३॥
भावार्थभाषाः - जो विद्वान् इस अनेक प्रकार के स्वरूपवाले संसार के कारण अव्यक्त को जानता है और इस संसार के रचनेवाले परमात्मा की प्रशंसा करता है, वही ऐश्वर्य्य से युक्त होता है ॥१३॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

सोमरक्षक

पदार्थान्वयभाषाः - [१] शरीर में उत्पन्न होनेवाली अन्तिम धातु 'सोम' है । इसका रक्षक पुरुष भी 'सोम' है । यह (सोमः) = सोमरक्षक पुरुष (गातुवित्) = मार्ग को जाननेवाला (जिगाति) = गतिवाला होता है, अर्थात् यह सोम सदा सुमार्ग पर चलता है। यह (देवानाम्) = देवों के (निष्कृतम्) = परिष्कृत स्थान को प्रति प्राप्त करता है, अर्थात् यह अपने घर को देवों का घर बनाता है। [२] इस प्रकार मार्ग पर चलता हुआ व अपने घर को देवगृह बनाता हुआ यह (ऋतस्य योनिम्) = ऋत के उत्पत्ति स्थान प्रभु को (आसदम्) = प्राप्त करने के लिए होता है। प्रभुप्राप्ति का मार्ग यही है कि हम सोमरक्षण द्वारा अपने जीवन को बड़ा परिष्कृत जीवन बनाएँ ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- सोमरक्षण द्वारा मार्ग पर चलते हुए अपना जीवन दिव्य बनाते हुए हम प्रभु को प्राप्त करें ।
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स्वामी दयानन्द सरस्वती

पुनस्तमेव विषयमाह।

अन्वय:

यो गातुवित्सोमो देवानामृतस्य निष्कृतमासदं योनिं जिगाति सोऽभीष्टसुखमेति ॥१३॥

पदार्थान्वयभाषाः - (सोमः) ऐश्वर्य्ययुक्तः (जिगाति) स्तौति (गातुवित्) प्रशंसावित् (देवानाम्) विदुषाम् (एति) प्राप्नोति (निष्कृतम्) नितरां विज्ञातम् (ऋतस्य) सत्यस्य (योनिम्) कारणम् (आसदम्) आसीदन्ति सर्वे यस्मिंस्तम् ॥१३॥
भावार्थभाषाः - यो विद्वानस्य विविधाकृतेर्विश्वस्य कारणमव्यक्तं जानाति एतन्निर्मातारं परमात्मानं प्रशंसति स एवैश्वर्यसम्पन्नो भवति ॥१३॥
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - The stream of peace and joy in meditation flows on by the paths of the mind and reaches where the senses and mind terminate, the very seat of light divine and origin of the spirit’s will to move into the existential flow.
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आचार्य धर्मदेव विद्या मार्तण्ड

The virtues of God are elaborated.

अन्वय:

The man who knows the glory of God and is blessed with the wealth of wisdom, praises the root cause of this universe (material in the form of प्रकृति i.e. matter and efficient in the form of God). All the enlightened persons dwell in it and know it well. Such a person attains desirable happiness.

भावार्थभाषाः - That man becomes prosperous and blessed with the wealth of wisdom, who knows the Primordial matter to be the material cause of this multi-form universe and glorifies God, Who is the Creator.
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माता सविता जोशी

(यह अनुवाद स्वामी दयानन्द सरस्वती जी के आधार पर किया गया है।)
भावार्थभाषाः - जे विद्वान अनेक प्रकारचे स्वरूप असलेल्या संसाराचे अव्यक्त कारण जाणतात व संसार निर्माण करणाऱ्या परमात्म्याची प्रशंसा करतात, तेच ऐश्वर्ययुक्त होतात. ॥ १३ ॥