तत्स॑वि॒तुर्वरे॑ण्यं॒ भर्गो॑ दे॒वस्य॑ धीमहि। धियो॒ यो नः॑ प्रचो॒दया॑त्॥
tat savitur vareṇyam bhargo devasya dhīmahi | dhiyo yo naḥ pracodayāt ||
तत्। स॒वि॒तुः। वरे॑ण्यम्। भर्गः॑। दे॒वस्य॑। धी॒म॒हि॒। धियः॑। यः। नः॒। प्र॒ऽचो॒दया॑त्॥
स्वामी दयानन्द सरस्वती
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं।
हरिशरण सिद्धान्तालंकार
[१] 'स चासौ सविता तत्सविता' (तत्सवितुः) = उस प्रसिद्ध [व्यापक] प्रेरक व उत्पादक (देवस्य) = सब व्यवहारों के साधक व प्रकाशमय प्रभु के (वरेण्यं भर्गः) = वरणीय तेज को धीमहि हम धारण करें-उस तेज का ही ध्यान करें। प्रकृति के दृष्टिकोण से 'सविता' उत्पादक हैं, जीव के दृष्टिकोण से वे प्रेरक हैं। हृदयस्थरूपेण प्रभु जीव को प्रेरणा प्राप्त करा रहे हैं। इसी प्रकार प्रकृति के दृष्टिकोण से 'देव' सब व्यवहारों के साधक व सब क्रीड़ाओं को करनेवाले हैं, जीव के दृष्टिकोण से वे प्रकाशमय हैं- हृदयस्थरूपेण वे ज्ञान का प्रकाश प्राप्त करा रहे हैं । [२] उस परमेश्वर के तेज को हम धारण करें, (यः) = जो कि (नः धियः) = हमारी बुद्धियों को (प्रचोदयात्) = प्रकृष्ट प्रेरणा दें। वे प्रभु हमें निरन्तर उत्तम प्रेरणाओं को प्राप्त करा रहे हैं। इन प्रेरणाओं के अनुसार चलने से ही हम प्रभु का तेज धारण करनेवाले बनते हैं।
स्वामी दयानन्द सरस्वती
पुनस्तमेव विषयमाह।
हे मनुष्याः सर्वे वयं यो नो धियः प्रचोदयात्तस्य सवितुर्देवस्य तद्वरेण्यं भर्गो धीमहि ॥१०॥
डॉ. तुलसी राम
आचार्य धर्मदेव विद्या मार्तण्ड
The same subject of God is dealt.
O men! we meditate upon and try to imbibe in us, that most desirable light of God which eradicates sins and Who is the Creator and Lord of the world. He is resplendent and illuminator of all and Omnipresent and indwelling spirit, so that He may inspire and purify our intellects to perform always good deeds.
