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पु॒रो॒ळाशं॑ सनश्रुत प्रातःसा॒वे जु॑षस्व नः। इन्द्र॒ क्रतु॒र्हि ते॑ बृ॒हन्॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

puroḻāśaṁ sanaśruta prātaḥsāve juṣasva naḥ | indra kratur hi te bṛhan ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

पु॒रो॒ळास॑म्। स॒न॒ऽश्रु॒त॒। प्रा॒तः॒ऽसा॒वे। जु॒ष॒स्व॒। नः॒। इन्द्र॑। क्रतुः॑। हि। ते॒। बृ॒हन्॥

ऋग्वेद » मण्डल:3» सूक्त:52» मन्त्र:4 | अष्टक:3» अध्याय:3» वर्ग:17» मन्त्र:4 | मण्डल:3» अनुवाक:4» मन्त्र:4


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स्वामी दयानन्द सरस्वती

फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं।

पदार्थान्वयभाषाः - हे (सनश्रुत) सत्य और असत्य के विचारकर्त्ताओं से उत्तम कृत्य सुना जिसने ऐसे (इन्द्र) विद्या और ऐश्वर्य से युक्त (हि) जिससे (ते) आपकी (क्रतुः) बुद्धि वा कर्म्म (बृहन्) बड़ा है तिससे आप (प्रातःसावे) जो प्रातःकाल में किया जाय उसमें (नः) हम लोगों के (पुरोडाशम्) उत्तम प्रकार संस्कारयुक्त अन्नविशेष का (जुषस्व) सेवन करो ॥४॥
भावार्थभाषाः - मनुष्यों को चाहिये कि जिन पुरुषों में जैसी विद्या और शीलता होवे, वैसी ही उन पर उत्तम कृपा करें ॥४॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

प्रज्ञान व शक्तिवर्धन

पदार्थान्वयभाषाः - [१] [सन = Food] हे (सन-श्रुत) = अपने सात्त्विक भोजन के कारण प्रसिद्ध जीव तू (प्रात: सावे) = जीवन के प्रथम चौबीस वर्षरूप प्रातः सवन में (नः) = हमारे इस (पुरोडाशम्) = [पुर: दाशते यज्ञार्थम्] यज्ञशेषरूप अमृत का ही (जुषस्व) = प्रीतिपूर्वक सेवन करनेवाला हो। [२] हे (इन्द्र) = जितेन्द्रिय पुरुष ! इस प्रकार यज्ञशेष का सेवन करने से (हि) = निश्चयपूर्वक (ते) = तेरा (क्रतुः) = प्रज्ञान व बल (बृहन्) = महान् होता है। यज्ञशेष का सेवन मस्तिष्क में प्रज्ञान को व शरीर में शक्ति को स्थापित करता है।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- हम यज्ञशेष का सेवन करें। इससे हमारी बुद्धि व बल दोनों बढ़ेंगे।
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स्वामी दयानन्द सरस्वती

पुनस्तमेव विषयमाह।

अन्वय:

हे सनश्रुतेन्द्र ! हि यतस्ते क्रतुर्बृहन्नस्ति तस्मात्वं प्रातःसावे नः पुरोडाशं जुषस्व ॥४॥

पदार्थान्वयभाषाः - (पुरोडाशम्) सुसंस्कृतमन्नविशेषम् (सनश्रुत) सत्याऽसत्यविवेकिनां सकाशाच्छ्रुतं येन यद्वा सनं सत्यासत्यविभाजकं वचनं श्रुतं येन तत्सम्बुद्धौ (प्रातःसवने) यः प्रातः सूयते निष्पद्यते तस्मिन् (जुषस्व) सेवस्व (नः) अस्माकम् (इन्द्र) विद्यैश्वर्य्ययुक्त (क्रतुः) प्रज्ञा कर्म वा (हि) यतः (ते) तव (बृहन्) महान् ॥४॥
भावार्थभाषाः - मनुष्यैर्येषु यादृशी विद्या शीलता भवेत् तादृश्येव तेषु सत्कृपा कार्या ॥४॥
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - Indra, lord of universal word of wisdom and discrimination, accept and enjoy our purodasha offered in the morning session of yajna. Great is your word and light and creative action of cosmic dimensions.
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आचार्य धर्मदेव विद्या मार्तण्ड

The same subject of duties of the rulers is stated.

अन्वय:

Indra (endowed with the wealth of wisdom) who have received education from discreet persons, and your intellect and deeds, they are indeed great. Therefore, accept as a mark of respect our well cooked food consisting of roti and ghee offered in the morning.

भावार्थभाषाः - Men should show respect and kindness to the people, according to their ability and character.
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माता सविता जोशी

(यह अनुवाद स्वामी दयानन्द सरस्वती जी के आधार पर किया गया है।)
भावार्थभाषाः - ज्या पुरुषांमध्ये जशी विद्या व शील असेल तशी माणसांनी त्यांच्यावर कृपा करावी. ॥ ४ ॥