धा॒नाव॑न्तं कर॒म्भिण॑मपू॒पव॑न्तमु॒क्थिन॑म्। इन्द्र॑ प्रा॒तर्जु॑षस्व नः॥
dhānāvantaṁ karambhiṇam apūpavantam ukthinam | indra prātar juṣasva naḥ ||
धा॒नाऽव॑न्तम्। क॒र॒म्भिण॑म्। अ॒पू॒पऽव॑न्तम्। उ॒क्थिन॑म्। इन्द्र॑। प्रा॒तः। जु॒ष॒स्व॒। नः॒॥
स्वामी दयानन्द सरस्वती
अब आठ ऋचावाले बावनवें सूक्त का आरम्भ है। उसके प्रथम मन्त्र में राजा के विषय कहते हैं।
हरिशरण सिद्धान्तालंकार
प्रातः सवन में सोम का रक्षण
स्वामी दयानन्द सरस्वती
अथ राजविषयमाह।
हे इन्द्र ! त्वं यथा प्रातर्धानावन्तं करम्भिणमपूपवन्तमुक्थिनं प्रातर्जुषस्व तथा नोऽस्मान् जुषस्व ॥१॥
डॉ. तुलसी राम
आचार्य धर्मदेव विद्या मार्तण्ड
The duties of a king are told.
O Indra (upholder of abundant wealth) ! lovingly serve us (learned men) in the morning, like a needy person approaches a wealthy who has store of fresh barley, parched grain, curds (milk products) and cakes and sanctified by recitation of the Vedic mantras.
माता सविता जोशी
(यह अनुवाद स्वामी दयानन्द सरस्वती जी के आधार पर किया गया है।)या सूक्तात राजा, प्रजा व यज्ञ, अन्नसंस्कार इत्यादी गुणांचे वर्णन असल्यामुळे या सूक्ताच्या अर्थाची मागच्या सूक्ताच्या अर्थाबरोबर संगती जाणावी.
