प्र ते॑ अश्नोतु कु॒क्ष्योः प्रेन्द्र॒ ब्रह्म॑णा॒ शिरः॑। प्र बा॒हू शू॑र॒ राध॑से॥
pra te aśnotu kukṣyoḥ prendra brahmaṇā śiraḥ | pra bāhū śūra rādhase ||
प्र। ते॒। अ॒श्नो॒तु॒। कु॒क्ष्योः। प्र। इ॒न्द्र॒। ब्रह्म॑णा। शिरः॑। प्र। बा॒हू इति॑। शू॒र॒। राध॑से॥
स्वामी दयानन्द सरस्वती
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं।
हरिशरण सिद्धान्तालंकार
'कुक्षि, शिर व बाहुओं' में सोम का प्रवेश
स्वामी दयानन्द सरस्वती
पुनस्तमेव विषयमाह।
हे इन्द्र ! यस्ते कुक्ष्योर्ब्रह्मणा सह रसः प्राश्नोतु। हे शूर तव शिरो बाहू राधसे प्राश्नोतु तं त्वं पालय ॥१२॥
डॉ. तुलसी राम
आचार्य धर्मदेव विद्या मार्तण्ड
The duties of the rulers are emphasized.
O Indra (noble king) ! may this Soma (invigorating juice) penetrate to our flanks, and may it bring you the idea of obtaining wealth hero. May it (juice) inculcate strength in your arms in order to acquire wealth (by increasing your vigor).
