वांछित मन्त्र चुनें
634 बार पढ़ा गया

पाति॑ प्रि॒यं रि॒पो अग्रं॑ प॒दं वेः पाति॑ य॒ह्वश्चर॑णं॒ सूर्य॑स्य। पाति॒ नाभा॑ स॒प्तशी॑र्षाणम॒ग्निः पाति॑ दे॒वाना॑मुप॒माद॑मृ॒ष्वः॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

pāti priyaṁ ripo agram padaṁ veḥ pāti yahvaś caraṇaṁ sūryasya | pāti nābhā saptaśīrṣāṇam agniḥ pāti devānām upamādam ṛṣvaḥ ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

पाति॑। प्रि॒यम्। रि॒पः। अग्र॑म्। प॒दम्। वेः। पाति॑। य॒ह्वः। चर॑णम्। सूर्य॑स्य। पाति॑। नाभा॑। स॒प्तऽशी॑र्षाणम्। अ॒ग्निः। पाति॑। दे॒वाना॑म्। उ॒प॒ऽमाद॑म्। ऋ॒ष्वः॥

634 बार पढ़ा गया
ऋग्वेद » मण्डल:3» सूक्त:5» मन्त्र:5 | अष्टक:2» अध्याय:8» वर्ग:24» मन्त्र:5 | मण्डल:3» अनुवाक:1» मन्त्र:5


स्वामी दयानन्द सरस्वती

फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है।

पदार्थान्वयभाषाः - हे विद्वान् ! जैसे (अग्निः) अग्नि (वेः) चलती हुई (रिपः) पृथिवी के (अग्रम्) ऊपरले (प्रियम्) प्रिय (पदम्) प्राप्त होने योग्य स्थान को (पाति) प्राप्त होता और (यह्वः) बड़ा बहुत होता हुआ (सूर्य्यस्य) सूर्य्य के (चरणम्) गमन को (पाति) प्राप्त होता वा (नाभा) बीच में वर्त्तमान अन्तरिक्ष में (सप्तशीर्षाणम्) सात प्रकार की शिर रूप किरणें जिसमें विद्यमान उस सूर्य्यमण्डल को (पाति) प्राप्त होता वा (ऋष्वः) प्राप्ति करानेवाला होता हुआ (देवानाम्) दिव्य विद्वानों के (उपमादम्) उस व्यवहार को जो उपमा दिलाता है (पाति) प्राप्त होता है, वैसे तुम होओ ॥५॥
भावार्थभाषाः - हे विद्वान् ! जैसे वह्नि चालवाले पृथिवी आदि लोकों की रक्षा और प्रकाश के निमित्त से उनकी रक्षा करनेवाला वर्त्तमान होता है, वैसे आप सबकी रक्षा करनेवाले होओ ॥५॥

हरिशरण सिद्धान्तालंकार

तीन कदमों को रखकर प्रभु के समीप पहुँचना

पदार्थान्वयभाषाः - [१] (रिपः) = [रिप्-क] हृदयस्थरूपेण उपदेश देनेवाले वे प्रभु (वेः) = इस गतिशील पृथ्वी के (अग्रम्) = श्रेष्ठ (प्रियम्) = प्रिय (पदम्) = कदम को पाति रक्षित करते हैं। 'पृथ्वी का कदम' शरीर को स्वस्थ रखना है ['पृथिवी शरीरम्'] । यह मनुष्य का प्रथम कर्त्तव्य है, इसके बिना अगले कदमों का रखना सम्भव ही नहीं। यह प्रिय इसलिए है कि स्वास्थ्य में ही सब आनन्दों का आधार है। स्वास्थ्य न होने पर सब आनन्द नीरस हो जाते हैं। प्रभु भोजनादि के विषय में उचित प्रेरणा देते हुए हमें स्वस्थ रहने योग्य बनाते हैं। [२] (यह्वः) = वे महान् प्रभु (सूर्यस्य) = सूर्यसम्बन्धी (चरणम्) = कदम का (पाति) = रक्षण करते हैं। यही द्युलोक सम्बद्ध कदम है। 'द्युलोक में जैसे सूर्योदय होता है, इसी प्रकार मस्तिष्करूप द्युलोक में ज्ञान सूर्य का उदय' यह दूसरा कदम है। [३] (अग्निः) = वे अग्रणी प्रभु (नाभा) = इन दोनों के मध्य में, नाभि में, अन्तरिक्ष में (सप्तशीर्षाणम्) = सात सिरोंवाले को पाति सुरक्षित करता है। हृदय में धर्मभावना का रक्षण ही अन्तरिक्ष सम्बन्धी कदम है। 'सप्त मर्यादा: कवयस्ततक्षुः' इस मन्त्रभाग में सप्त मर्यादाओंवाले धर्म का संकेत है, ये सात मर्यादाएँ ही धर्म के सात सिर हैं। यास्क के शब्दों में ये सात मर्यादाएँ इस प्रकार होती हैं – (स्तेयम्) = चोरी, (तल्पारोहणम्) = परस्त्रीगमन, (ब्रह्महत्या) = वेदज्ञ ब्राह्मण की हत्या अथवा अस्वाध्याय, (भ्रूणहत्या) = गर्भपात, (सुरापान) = शराब पीना, (दुष्कृतस्य कर्मणः पुनः पुनः सेवा) = बुरे काम का बार-बार करना, (पातके अनृतोघम्) = किसी पाप के छिपाने में झूठ बोलना। [४] 'एवं पहला कदम' शरीर को स्वस्थ बनाना, दूसरा ज्ञानसूर्योदय तथा तीसरा हृदय में सात मर्यादाओं के पालन की वृत्ति है । वह (ऋष्वः) = दर्शनीय प्रभु (देवानाम्) = तीन कदमों को रखकर देव बन जानेवाले पुरुषों के (उपमादम्) = परमेश्वर की उपासना में प्राप्त होनेवाले आनन्द का पाति रक्षण करते हैं। देववृत्तिवाले पुरुष प्रभु का उपासन करते हैं और आनन्द को प्राप्त करते हैं ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- हमारा शरीर स्वस्थ हो, मस्तिष्क में ज्ञानसूर्य उदित-हृदय में सात मर्यादाओंवाले धर्मपालन का भाव हो। इस प्रकार देव बनकर प्रभु की उपासना में हम आनन्द का अनुभव करें। तीन कदम रख कर हम चौथे स्थान में प्रभु के उपासक होते हैं 'सोमनात्मा चतुष्पात्' ।

स्वामी दयानन्द सरस्वती

पुनस्तमेव विषयमाह।

अन्वय:

हे विद्वन् ! यथाऽग्निर्वे रिपोऽग्रं प्रियं पदं पाति यह्वः सन् सूर्य्यस्य चरणं पाति नाभा सप्तशीर्षाणं पाति ऋष्वस्सन् देवानामुपमादं पाति तथा त्वं भव ॥५॥

पदार्थान्वयभाषाः - (पाति) (प्रियम्) (रिपः) पृथिव्याः (अग्रम्) उपरिभागम् (पदम्) प्राप्तव्यं स्थानम् (वेः) गन्त्र्याः (पाति) (यह्वः) महान् (चरणम्) गमनम् (सूर्य्यस्य) (पाति) (नाभा) मध्ये वर्त्तमानेऽन्तरिक्षे (सप्तशीर्षाणम्) सप्तविधानि शिरांसि किरणा यस्मिँस्तम् (अग्निः) पावकः (पाति) (देवानाम्) दिव्यानां विदुषाम् (उपमादम्) य उपमां ददाति तम् (ऋष्वः) प्रापकः ॥५॥
भावार्थभाषाः - हे विद्वन् ! यथा वह्निर्गतिमतां पृथिव्यादीनां रक्षाप्रकाशनिमित्तेन रक्षको वर्त्तते तथा त्वं सर्वेषां रक्षको भवेः ॥५॥

डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - Agni protects the friend and favourite, it protects the amplitude of the earth in orbit, and the flight of birds. Mighty powerful, it protects the rainbow colours of light in space and the orbit of the sun in the galaxy. Noble, elevated and sublime, it protects the pleasure and amusement of the noble people who are brilliant and generous.

आचार्य धर्मदेव विद्या मार्तण्ड

The duties and functions of the learned persons are stated.

अन्वय:

O learned person ! you should be like the Agni (God) which protects the basic movements of the moving earth. It protects the path of the sun, and protects the sun also with seven heads in the form of seven kinds of rays in the firmament. Being the Mightiest and the Greatest giver of happiness, He protects the one who among the enlightened persons bears some companions to Him, or is similar in purity, truth, justice and kindness etc.

भावार्थभाषाः - O learned person ! as fire created and ordained by God is the protector of the earth and other objects through light and heat, so you should also be the protector of all.

माता सविता जोशी

(यह अनुवाद स्वामी दयानन्द सरस्वती जी के आधार पर किया गया है।)
भावार्थभाषाः - हे विद्वाना! जसा अग्नी गतिमान पृथ्वी व प्रकाशाचे निमित्त असून त्यांचा रक्षक असतो तसे तूही सर्वांचे रक्षण कर. ॥ ५ ॥