अ॒यं ते॑ अस्तु हर्य॒तः सोम॒ आ हरि॑भिः सु॒तः। जु॒षा॒ण इ॑न्द्र॒ हरि॑भिर्न॒ आ ग॒ह्या ति॑ष्ठ॒ हरि॑तं॒ रथ॑म्॥
ayaṁ te astu haryataḥ soma ā haribhiḥ sutaḥ | juṣāṇa indra haribhir na ā gahy ā tiṣṭha haritaṁ ratham ||
अ॒यम्। ते॒। अ॒स्तु॒। ह॒र्य॒तः। सोमः॑। आ। हरि॑ऽभिः। सु॒तः। जु॒षा॒णः। इ॒न्द्र॒। हरि॑ऽभिः। नः॒। आ। ग॒हि॒। आ। ति॒ष्ठ॒। हरि॑तम्। रथ॑म्॥
स्वामी दयानन्द सरस्वती
अब पाँच ऋचावाले चवालीसवें सूक्त का आरम्भ है। इसके प्रथम मन्त्र में सूर्य्य के विषय को कहते हैं।
हरिशरण सिद्धान्तालंकार
सोमरक्षण से प्रभुप्राप्ति
स्वामी दयानन्द सरस्वती
अथ सूर्य्यविषयमाह।
हे इन्द्र ! हर्यतस्ते हरिभिर्योऽयं सोमः सुतोऽस्तु तं जुषाणः सन् हरिभिर्हरितं रथमातिष्ठानेन नोऽस्मानागहि ॥१॥
डॉ. तुलसी राम
आचार्य धर्मदेव विद्या मार्तण्ड
The power and qualities of the sun are stated.
O Indra (desirous of prosperity ) ! the abundant wealth you have acquired by legitimate means like the use of horses in the battles, using that properly, mount on your charming chariot with your steads and come to us.
माता सविता जोशी
(यह अनुवाद स्वामी दयानन्द सरस्वती जी के आधार पर किया गया है।)या सूक्तात सूर्य, विद्युत, वायू व विद्वानांच्या गुणांचे वर्णन असल्यामुळे या सूक्ताच्या अर्थाची मागच्या सूक्ताच्या अर्थाबरोबर संगती जाणावी.
