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वार्त्र॑हत्याय॒ शव॑से पृतना॒षाह्या॑य च। इन्द्र॒ त्वा व॑र्तयामसि॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

vārtrahatyāya śavase pṛtanāṣāhyāya ca | indra tvā vartayāmasi ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

वार्त्र॑ऽहत्याय। शव॑से। पृ॒त॒ना॒ऽसह्या॑य। च॒। इन्द्र॑। त्वा॒। व॒र्त्त॒या॒म॒सि॒॥

ऋग्वेद » मण्डल:3» सूक्त:37» मन्त्र:1 | अष्टक:3» अध्याय:2» वर्ग:21» मन्त्र:1 | मण्डल:3» अनुवाक:3» मन्त्र:1


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स्वामी दयानन्द सरस्वती

अब ग्यारह ऋचावाले सैंतीसवें सूक्त का प्रारम्भ है। उसके प्रथम मन्त्र में राजा के गुणों को अगले मन्त्र में कहते हैं।

पदार्थान्वयभाषाः - हे (इन्द्र) सेना के अधीश ! जैसे हम लोग (वार्त्रहत्याय) मेघ के नाश करने के लिये जो बल उसके लिये सूर्य के समान (पृतनाषाह्याय) संग्राम के सहनेवाले (शवसे) बल के लिये (त्वा) आपका (वर्त्तयामसि) आश्रय करते हैं वैसे आप (च) भी हम लोगों को इस बल के लिये वर्त्तो ॥१॥
भावार्थभाषाः - इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। युद्ध करने की विद्या के शिक्षकों को चाहिये कि सेनाओं के अध्यक्ष और नोकरों को उत्तम प्रकार शिक्षा देवैं, जिससे निश्चित विजय होवै ॥१॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

अन्तः व बाह्य शत्रुओं का अभिभव

पदार्थान्वयभाषाः - [१] हे (इन्द्र) = सर्वशक्तिमन्, सब शत्रुओं का विद्रावण करनेवाले प्रभो ! हम (वार्त्रहत्याय) = वृत्रहननरूप कार्य के लिए (शवसे) = बल प्राप्ति के लिए (त्वा) = आपको (वर्तयामसि) = प्रवृत्त करते हैं। आपने ही इन ज्ञान की आवरणभूत वासनाओं का विनाश करना है। हमारे लिए तो इस काम का विनाश असम्भव-सा प्रतीत होता है। आपकी कृपा होगी और हम वासना को जीत पाएँगे । [२] हे प्रभो ! (पृतनाषाह्याय च) = परायी सेनाओं के अभिभव के लिए भी हम आपको ही प्रवृत्त करते हैं। इन शत्रु-सैन्यों पर भी आपकी कृपा से ही हमने विजय पानी है। चाहे अन्तः-शत्रु हों, चाहे बाह्य, प्रभु से शक्ति पाकर ही हम इन्हें जीतते हैं ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- प्रभु का स्मरण हमें वह शक्ति देता है, जिससे कि हम अन्तः व बाह्य- शत्रुओं को जीत पाते हैं।
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स्वामी दयानन्द सरस्वती

अथ राजगुणानाह।

अन्वय:

हे इन्द्र ! यथा वयं वार्त्रहत्याय सूर्यमिव पृतनाषाह्याय शवसे त्वा वर्त्तयामसि तथा त्वं चास्मानेतस्मै वर्त्तय ॥१॥

पदार्थान्वयभाषाः - (वार्त्रहत्याय) वृत्रहत्याया इदं तस्मै (शवसे) बलाय (पृतनाषाह्याय) पृतना सह्या येन तस्मै (च) (इन्द्र) सेनाधीश (त्वा) त्वाम् (आ) (वर्त्तयामसि) वर्त्तयामः ॥१॥
भावार्थभाषाः - अत्र वाचकलुप्तोपमालङ्कारः। युद्धविद्याशिक्षकैः सेनाध्यक्षा भृत्याश्च सम्यक् शिक्षणीया यतो ध्रुवो विजयः स्यात् ॥१॥
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - Indra, lord of honour and valour, commander of the forces of life and freedom, we pledge to abide by you and exhort you for breaking of the clouds of rain, for the destruction of darkness and evil, for rousing courage and valour, and for challenging and beating back the enemy in battle. And we pray, inspire and exhort us too with full power and preparation.
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आचार्य धर्मदेव विद्या मार्तण्ड

The attributes of a king are told.

अन्वय:

O Indra (commander of the army)! we urge upon you to annihilate the enemies, like the sun destroying the clouds, in order to overpower the hostile armies. So you should encourage us also to do so.

भावार्थभाषाः - It is the duty of the persons in charge of military training, to train well the commanders and their combatants, in order to ensure the victory.
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माता सविता जोशी

(यह अनुवाद स्वामी दयानन्द सरस्वती जी के आधार पर किया गया है।)

या प्रकारे राजा व प्रजेच्या कामाचे वर्णन असल्यामुळे या सूक्तार्थाची पूर्व सूक्तार्थाबरोबर संगती जाणावी.

भावार्थभाषाः - या मंत्रात वाचकलुप्तोपमालंकार आहे. युद्धविद्या शिक्षकांनी सेनाध्यक्ष व नोकरांना उत्तम प्रकारे शिक्षण द्यावे, ज्यामुळे निश्चित विजय मिळेल. ॥ १ ॥