तिष्ठा॒ हरी॒ रथ॒ आ यु॒ज्यमा॑ना या॒हि वा॒युर्न नि॒युतो॑ नो॒ अच्छ॑। पिबा॒स्यन्धो॑ अ॒भिसृ॑ष्टो अ॒स्मे इन्द्र॒ स्वाहा॑ ररि॒मा ते॒ मदा॑य॥
tiṣṭhā harī ratha ā yujyamānā yāhi vāyur na niyuto no accha | pibāsy andho abhisṛṣṭo asme indra svāhā rarimā te madāya ||
तिष्ठ॑। हरी॒ इति॑। रथे॑। आ। यु॒ज्यमा॑ना। या॒हि। वा॒युः। न। नि॒ऽयुतः॑। नः॒। अच्छ॑। पिबा॑सि। अन्धः॑। अ॒भिऽसृ॑ष्टः। अ॒स्मे इति॑। इन्द्र॑। स्वाहा॑। र॒रि॒म। ते॒। मदा॑य॥
स्वामी दयानन्द सरस्वती
अब ग्यारह ऋचावाले पैंतीसवें सूक्त का प्रारम्भ है। उसके प्रथम मन्त्र से मनुष्यों को क्या करना चाहिये, इस विषय को अगले मन्त्र में कहा है।
हरिशरण सिद्धान्तालंकार
आत्मवश्य इन्द्रियों से कार्यों में प्रवृत्त होना
स्वामी दयानन्द सरस्वती
अथ मनुष्यैः किं कर्त्तव्यमित्याह।
हे इन्द्र राजँस्त्वं यस्मिन्रथे युज्यमाना हरी इव जलाग्नी वर्त्तेते तस्मिन्नातिष्ठ तेन वायुर्न नियुतो नोऽस्मानच्छ याहि। अभिसृष्टः सँस्तेऽस्मे यदन्धो मदाय ररिम तत्स्वाहा पिबासि ॥१॥
डॉ. तुलसी राम
आचार्य धर्मदेव विद्या मार्तण्ड
What should men do is told.
O Indra! You possess much wealth and stay in your chariot/car having yoked water and fire which are like the horses. Come to us who are in the company of the noble persons and are very far away from the wicked like the air. We request you to drink the juice prepared with reverence and truth for your exhilaration of the invigorating herbs.
माता सविता जोशी
(यह अनुवाद स्वामी दयानन्द सरस्वती जी के आधार पर किया गया है।)या सूक्तात अग्नी इत्यादी पदार्थ व घोड्याच्या दृष्टान्ताचा उपदेश करण्याने या सूक्ताच्या अर्थाची पूर्व सूक्तार्थाबरोबर संगती जाणावी.
