इन्द्रा॑ग्नी॒ आ ग॑तं सु॒तं गी॒र्भिर्नभो॒ वरे॑ण्यम्। अ॒स्य पा॑तं धि॒येषि॒ता॥
indrāgnī ā gataṁ sutaṁ gīrbhir nabho vareṇyam | asya pātaṁ dhiyeṣitā ||
इन्द्रा॑ग्नी॒ इति॑। आ। ग॑तम्। सु॒तम्। गीः॒ऽभिः। नभः॑। वरे॑ण्यम्। अ॒स्य। पा॒त॒म्। धि॒या। इ॒षि॒ता॥
स्वामी दयानन्द सरस्वती
अब नव ऋचावाले बारहवें सूक्त का आरम्भ है। उसके प्रथम मन्त्र में अध्यापक और उपदेशक का विषय कहते हैं।
हरिशरण सिद्धान्तालंकार
वरेण्य नभस्
स्वामी दयानन्द सरस्वती
अथाध्यापकोपदेशकविषयमाह।
हे अध्यापकोपदेशकौ ! युवामिन्द्राग्नी इवास्य मध्ये वर्त्तमानाविषिता गीर्भिर्धिया नभो वरेण्यं सुतं पातम्। विद्याप्रचारायाऽऽगतम् ॥१॥
डॉ. तुलसी राम
आचार्य धर्मदेव विद्या मार्तण्ड
The duties of the teacher and preacher are told.
O teacher and preacher! you are like the air and electricity or the sun. You are givers of knowledge, protect the acceptable firmament and other worlds and your son/pupil. Come for the dissemination of knowledge.
माता सविता जोशी
(यह अनुवाद स्वामी दयानन्द सरस्वती जी के आधार पर किया गया है।)या सूक्तात इन्द्र, अग्नी, अध्यापक, उपदेशक व सेना आणि सेनेचे स्वामी यांच्या गुणांचे वर्णन असल्यामुळे या सूक्ताच्या अर्थाची पूर्व सूक्तार्थाबरोबर संगती आहे हे जाणले पाहिजे.
