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अत्रि॒मनु॑ स्व॒राज्य॑म॒ग्निमु॒क्थानि॑ वावृधुः। विश्वा॒ अधि॒ श्रियो॑ दधे॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

atrim anu svarājyam agnim ukthāni vāvṛdhuḥ | viśvā adhi śriyo dadhe ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

अत्रि॑म्। अनु॑। स्व॒ऽराज्य॑म्। अ॒ग्निम्। उ॒क्थानि॑। व॒वृ॒धुः॒। विश्वाः॑। अधि॑। श्रियः॑। द॒धे॒॥

ऋग्वेद » मण्डल:2» सूक्त:8» मन्त्र:5 | अष्टक:2» अध्याय:5» वर्ग:29» मन्त्र:5 | मण्डल:2» अनुवाक:1» मन्त्र:5


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स्वामी दयानन्द सरस्वती

अब विद्वानों के विषय को अगले मन्त्र में कहा है।

पदार्थान्वयभाषाः - हे मनुष्यो ! जो (उक्थानि) कहने योग्य वचन (अत्रिम्) सब पदार्थ भक्षण करनेवाले (स्वराज्यम्) अपने प्रकाश से युक्त (अग्निम्) बिजुली रूप अग्नि को (अनु,वावृधुः) अनुकूलता से बढ़ाते हैं, और जैसे उनसे (विश्वाः) समस्त (श्रियः) धनों को (अधि,दधे) अधिक-अधिक मैं धारण करता हूँ, वैसे तुमको भी धारण करना चाहिये ॥५॥
भावार्थभाषाः - इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। विद्वानों की योग्यता है, कि जिन उपदेशों से अग्न्यादि पदार्थविद्या राज्यलक्ष्मी बढ़े, उनसे सबको उद्योगी करें ॥५॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

अत्रि व स्वराज्य

पदार्थान्वयभाषाः - १. हमारे जीवनों में (अत्रिम् अनु) = अत्रि का लक्ष्य करके [अनुर्लक्षणे] (उक्थानि वावृधुः) = प्रभु के स्तोत्र बढ़ते हैं, अर्थात् हम इसलिए प्रभु के स्तोत्रों को करते हैं कि हम अत्रि बन सकेंहमारे जीवन से 'काम-क्रोध-लोभ' ये तीनों ही आसुरभाव लुप्त हो जाएँ। २. इसी प्रकार (स्वराज्यम्) = अनु–आत्मशासन का लक्ष्य करके हमारे जीवन में प्रभु के स्तोत्र बढ़ते हैं। प्रभु-स्तवन से हम आत्मसंयमवाले होते हैं और इस प्रकार वे प्रभु (विश्वाः) = सब श्(रियः) = श्रियों को (अधिदधे) = आधिक्येन धारण करते हैं, जो भी पुरुष 'अत्रि व स्वराज्य' बनता है, 'काम, क्रोध, लोभ' से ऊपर उठता है तथा अपना शासन अपने आप करता है' वह श्रीसम्पन्न जीवनवाला होता है ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ - हम अत्रि व स्वराज्य बनने के लिए ख़ूब ही प्रभुस्तवन करें। इसी प्रकार हमारा जीवन श्रीसम्पन्न बनेगा।
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स्वामी दयानन्द सरस्वती

अथ विद्वद्विषयमाह।

अन्वय:

हे मनुष्या यान्युक्थान्यत्रिं स्वराज्यमग्निं चानु वावृधुर्यथा तैर्विश्वाः श्रियोऽहमधिदधे तथा युष्माभिरप्याचरणीयम् ॥५॥

पदार्थान्वयभाषाः - (अत्रिम्) अत्तारम् (अनु) (स्वराज्यम्) स्वप्रकाशवन्तम् (अग्निम्) विद्युतम् (उक्थानि) वक्तुं योग्यानि वचनानि (वावृधुः) वर्द्धयन्ति (विश्वाः) अखिलाः (अधि) (श्रियः) लक्ष्मीः (दधे) उपरि दधाति ॥५॥
भावार्थभाषाः - अत्र वाचकलुप्तोपमालङ्कारः। विदुषां योग्यताऽस्ति यैरुपदेशैरग्न्यादिपदार्थविद्या राज्यश्रियश्च वर्द्धेरँस्तैः सर्वानुद्योगिनः सम्पादयन्तु ॥५॥
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - Holy words of praise and appreciation advance and celebrate Agni, light and power of the world, self- refulgent, free and self-governing, which devours the offerings of yajna and yields the beauty and fragrance of life beyond all three kinds of physical, mental and spiritual ailments and discomfort. For that reason I bear and abide by it above all other wealth and beauty of the world.
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आचार्य धर्मदेव विद्या मार्तण्ड

Because of capability of scientists and technologists, a State becomes prosperous.

अन्वय:

O persons! these scientists and technologists discover energy in the form of power, which in return brings increased production and self-sustenance and prosperity in a balanced way. As I seek and achieve all sorts of prosperity, let you should also emulate it.

भावार्थभाषाः - Here is a simile. The scientists and technologists should bring their state on the path of prosperity and tell the people about the means and methods to be used to procure it. It ultimately requires efforts to make the people hard-working and industrious.
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माता सविता जोशी

(यह अनुवाद स्वामी दयानन्द सरस्वती जी के आधार पर किया गया है।)
भावार्थभाषाः - या मंत्रात वाचकलुप्तोपमालंकार आहे. विद्वानांच्या उपदेशांनी अग्नी इत्यादी पदार्थविद्या, राज्यलक्ष्मी वाढते. त्याद्वारे सर्वांना उद्योगी बनवावे. ॥ ५ ॥