आ यः स्व१॒॑र्ण भा॒नुना॑ चि॒त्रो वि॒भात्य॒र्चिषा॑। अ॒ञ्जा॒नो अ॒जरै॑र॒भि॥
ā yaḥ svar ṇa bhānunā citro vibhāty arciṣā | añjāno ajarair abhi ||
आ। यः। स्वः॑। न। भा॒नुना॑। चि॒त्रः। वि॒ऽभाति॑। अ॒र्चिषा॑। अ॒ञ्जा॒नः। अ॒जरैः॑। अ॒भि॥
स्वामी दयानन्द सरस्वती
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है।
हरिशरण सिद्धान्तालंकार
१. (यः) = जो प्रभु (अर्चिषा) = ज्ञानाग्नि की ज्वालाओं से इस प्रकार (आविभाति) = सर्वतः दीस होते हैं, (न) = जैसे कि (भानुना) = किरणों की दीप्ति से (स्वः) = सूर्य चमकता है। आदित्य वर्ण तो वे हैं ही। इसी कारण वे प्रभु (चित्रः) = अद्भुत हैं अथवा [चायनीयः] पूजनीय आदरणीय हैं । २. ये प्रभु (अजरैः) = अपने न जीर्ण होनेवाले ज्ञान के प्रकाशों से (अभि अञ्जानः) = हमारे जीवनों को अन्दर बाहर से अलंकृत कर रहे हैं- हमें आन्तरिक व (बाह्य) दीप्ति प्राप्त कराके वे प्रभु हमें स्वलंकृत जीवनवाला बनाते हैं ।
स्वामी दयानन्द सरस्वती
पुनस्तमेव विषयमाह।
यो विद्युद्रूपश्चित्रोऽजरैरभ्यञ्जानोऽग्निरर्चिषा भानुना स्वर्ना विभाति स सर्वैरन्वेषणीयः ॥४॥
डॉ. तुलसी राम
आचार्य धर्मदेव विद्या मार्तण्ड
The secrets of energy are highlighted.
The energy is existent in electricity, power, fire, sun etc. With its eternal qualities, it is manifested in all the substances in the various forms, like good light, sunshine etc. We should discover its secret through pretty well procedures to brighten our lives.
