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विश्वा॑ उ॒त त्वया॑ व॒यं धारा॑ उद॒न्या॑इव। अति॑ गाहेमहि॒ द्विषः॑॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

viśvā uta tvayā vayaṁ dhārā udanyā iva | ati gāhemahi dviṣaḥ ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

विश्वाः॑। उ॒त। त्वया॑। व॒यम्। धाराः॑। उ॒द॒न्याः॑ऽइव। अति॑। गा॒हे॒म॒हि॒। द्विषः॑॥

ऋग्वेद » मण्डल:2» सूक्त:7» मन्त्र:3 | अष्टक:2» अध्याय:5» वर्ग:28» मन्त्र:3 | मण्डल:2» अनुवाक:1» मन्त्र:3


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स्वामी दयानन्द सरस्वती

फिर विद्वानों के विषय को अगले मन्त्र में कहा है।

पदार्थान्वयभाषाः - हे विद्वान् ! जैसे (त्वया) आप्त विद्वान् जो आप उनके साथ वर्त्तमान हम लोग (धाराः) (उदन्याइव) जल की धाराओं को जैसे वैसे (विश्वाः) समस्त (द्विषः) वैर वृत्तियों को (अति, गाहेमहि) अवगाहें, बिलोड़ें, मथें वैसे आप (उत) भी इनको गाहो ॥३॥
भावार्थभाषाः - इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जैसे जल की धारा प्राप्त हुए स्थान को छोड़ दूसरे स्थान को जाती हैं, वैसे शत्रुभाव को छोड़ मित्रभाव को सब मनुष्य प्राप्त होवें ॥३॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

द्वेष की नदी का तैर जाना

पदार्थान्वयभाषाः - १. हे प्रभो ! (वयम्) = हम (त्वया) = आपके साथ मिलकर-आपकी उपासना में स्थित होते हुए- (उत) = निश्चय से (विश्वा) = हमारे न चाहते हुए भी हमारे में घुस आनेवाली (द्विषः) = इन सब द्वेष की भावनाओं को (अतिगाहेमहि) = लांघ कर पार हो जाएँ। इन द्वेष की धाराओं में डूब न जाएँ । २. हम इन द्वेषभावों को इस प्रकार पारकर जाएँ (इव) = जैसे कि (उदन्या:) = जलसम्बन्धिनी (धाराः) = धाराओं को पार कर जाते हैं। तेज़ जलधारा में अकेले व्यक्ति के डूबने की आशंका होती है, परन्तु दूसरे का हाथ पकड़कर हम उस धारा को जैसे पार कर जाते हैं, उसी प्रकार प्रभु का हाथ पकड़कर हम ईर्ष्या, द्वेष की प्रबल धाराओं को लाँघ जाएँगे। प्रभु की उपासना का सर्वमहान् लाभ यही है कि हम सर्वत्र बन्धुत्व का अनुभव करते हुए द्वेष में कभी नहीं फंसते ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ - प्रभु के आश्रय से हम द्वेष की इस भयंकर नदी को तैर जाएँ ।
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स्वामी दयानन्द सरस्वती

पुनर्विद्वद्विषयमाह।

अन्वय:

हे विद्वन् यथा त्वया सह वर्त्तमाना वयं धारा उदन्याइव विश्वा द्विषोऽतिगाहेमहि तथा त्वमुताप्येताः गाहेथाः ॥३॥

पदार्थान्वयभाषाः - (विश्वाः) सर्वाः (उत) अपि (त्वया) आप्तेन विदुषा सह (वयम्) (धाराः) (उदन्याइव) उदकसम्बन्धिन्य इव (अति) उल्लङ्घने (गाहेमहि) (द्विषः) द्वेषवृत्तीः ॥३॥
भावार्थभाषाः - अत्र वाचकलुप्तोपमालङ्कारः। यथा उदकस्य धाराः प्राप्तं स्थानं त्यक्त्वा स्थानान्तरं गच्छन्ति तथा शत्रुभावं विहाय मित्रभावं सर्वे मनुष्याः प्राप्नुवन्तु ॥३॥
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - Agni, lord of light and knowledge, brilliant ruling power of the world, let us all, with you and by your divine grace, plunge and penetrate into all forces of hate and enmity, explore and fight and cross over the evils as navigators cross over the turbulent waves of the sea.
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आचार्य धर्मदेव विद्या मार्तण्ड

The subject of scholars goes on.

अन्वय:

O scholar ! let us make a self-introspection deeply to locate our evil spirits like the currents of water. You set an example.

भावार्थभाषाः - As the river currents change their courses often, similarly we should also give up enmity and switch over to the friendliness.
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माता सविता जोशी

(यह अनुवाद स्वामी दयानन्द सरस्वती जी के आधार पर किया गया है।)
भावार्थभाषाः - या मंत्रात वाचकलुप्तोपमालंकार आहे. जशी जलधारा एका स्थानाहून दुसऱ्या स्थानी जाते तसे शत्रुभाव सोडून मित्रभावाने वागावे. ॥ ३ ॥