विश्वा॑ उ॒त त्वया॑ व॒यं धारा॑ उद॒न्या॑इव। अति॑ गाहेमहि॒ द्विषः॑॥
viśvā uta tvayā vayaṁ dhārā udanyā iva | ati gāhemahi dviṣaḥ ||
विश्वाः॑। उ॒त। त्वया॑। व॒यम्। धाराः॑। उ॒द॒न्याः॑ऽइव। अति॑। गा॒हे॒म॒हि॒। द्विषः॑॥
स्वामी दयानन्द सरस्वती
फिर विद्वानों के विषय को अगले मन्त्र में कहा है।
हरिशरण सिद्धान्तालंकार
द्वेष की नदी का तैर जाना
स्वामी दयानन्द सरस्वती
पुनर्विद्वद्विषयमाह।
हे विद्वन् यथा त्वया सह वर्त्तमाना वयं धारा उदन्याइव विश्वा द्विषोऽतिगाहेमहि तथा त्वमुताप्येताः गाहेथाः ॥३॥
डॉ. तुलसी राम
आचार्य धर्मदेव विद्या मार्तण्ड
The subject of scholars goes on.
O scholar ! let us make a self-introspection deeply to locate our evil spirits like the currents of water. You set an example.
