मा नो॒ अरा॑तिरीशत दे॒वस्य॒ मर्त्य॑स्य च। पर्षि॒ तस्या॑ उ॒त द्वि॒षः॥
mā no arātir īśata devasya martyasya ca | parṣi tasyā uta dviṣaḥ ||
मा। नः॒। अरा॑तिः। ई॒श॒त॒। दे॒वस्य॑। मर्त्य॑स्य। च॒। पर्षि॑। तस्याः॑। उ॒त। द्वि॒षः॥
स्वामी दयानन्द सरस्वती
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है।
हरिशरण सिद्धान्तालंकार
अदान की भावना से दूर
स्वामी दयानन्द सरस्वती
पुनस्तमेव विषयमाह।
हे विद्वन्नो देवस्य मर्त्त्यस्य चारातिर्मेशत उतापि तस्या द्विषो नः पर्षि पारं नय ॥२॥
डॉ. तुलसी राम
आचार्य धर्मदेव विद्या मार्तण्ड
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