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मा नो॒ अरा॑तिरीशत दे॒वस्य॒ मर्त्य॑स्य च। पर्षि॒ तस्या॑ उ॒त द्वि॒षः॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

mā no arātir īśata devasya martyasya ca | parṣi tasyā uta dviṣaḥ ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

मा। नः॒। अरा॑तिः। ई॒श॒त॒। दे॒वस्य॑। मर्त्य॑स्य। च॒। पर्षि॑। तस्याः॑। उ॒त। द्वि॒षः॥

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ऋग्वेद » मण्डल:2» सूक्त:7» मन्त्र:2 | अष्टक:2» अध्याय:5» वर्ग:28» मन्त्र:2 | मण्डल:2» अनुवाक:1» मन्त्र:2


स्वामी दयानन्द सरस्वती

फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है।

पदार्थान्वयभाषाः - हे विद्वान् ! (नः) हम (देवस्थ) विद्वान् (मर्त्यस्य, च) और अविद्वान् का (अरातिः) शत्रुः (मा, ईशत) मत समर्थ हो (उत) और हम लोगों को और (तस्याः) उस (द्विषः) अप्रीतिवाले शत्रु के (पर्षि) पार पहुँचाइये ॥२॥
भावार्थभाषाः - जो द्वेष छोड़ धार्मिक विद्वानों की तथा अविद्वानों के साथ प्रीति उत्पन्न कराते हैं, वे किसी से तिरस्कार को नहीं प्राप्त होते हैं ॥२॥

हरिशरण सिद्धान्तालंकार

अदान की भावना से दूर

पदार्थान्वयभाषाः - १. गतमन्त्र में 'पुरुस्पृह' रयि की प्रार्थना थी। उसी प्रसंग में कहते हैं कि (नः) = हमें (अरातिः) = न देने की भावना (मा ईशत) = शासित करनेवाली न हो जाए। हमारे में अदान की भावना प्रबल न हो जाए। चाहे यह अदान की भावना (देवस्य) = देवसम्बन्धिनी हो (च) = अथवा (मर्त्यस्य) = मनुष्य सम्बन्धिनी हो । देवों के विषय में अदान की भावना के होने पर हमारे जीवनों से 'देवयज्ञ' आदि श्रेष्ठ कर्मों का लोप हो जाता है और मनुष्यों के विषय में अदान की भावना अन्य सब यज्ञों को हमारे से लुप्त कर देती है-हम कोई भी लोकहित का कार्य नहीं कर पाते । २. इसलिए हे प्रभो ! (तस्याः पर्षि) = हमें अदान की भावना से पार करिए - हम अदान की भावना में न डूब जाएँ। (उत) = और हमें (द्विषः) = सब द्वेष की भावनाओं से भी पर्षि-ऊपर उठाइए। हम ईर्ष्या, द्वेष में ही न फंसे रह जाएँ । =
भावार्थभाषाः - भावार्थ- हे प्रभो ! हमें अदान की भावना से ऊपर उठाइए। सब द्वेषों से दूर करिए।

स्वामी दयानन्द सरस्वती

पुनस्तमेव विषयमाह।

अन्वय:

हे विद्वन्नो देवस्य मर्त्त्यस्य चारातिर्मेशत उतापि तस्या द्विषो नः पर्षि पारं नय ॥२॥

पदार्थान्वयभाषाः - (मा) (नः) अस्मान् (अरातिः) शत्रुः (ईशत) समर्थो भवेत् (देवस्य) विदुषः (मर्त्यस्य) अविदुषः (च) (पर्षि) पिपूरय (तस्याः) (उत) अपि (द्विषः) अप्रीतेः ॥२॥
भावार्थभाषाः - ये द्वेषं विहाय धार्मिकाणां विदुषामविदुषां च सङ्गेन सर्वेषु प्रीतिं जनयन्ति ते केनापि तिरस्कृता न जायन्ते ॥२॥

डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - Agni, generous and brilliant lord ruler of the world of life, let no one who is selfish, ungenerous, uncreative and graceless rule over us, whether we are learned and bright or just simple ordinary folk living as children of nature. Liberate us from him, purge us of the hateful and the envious within and without, and purge him too of hate and enmity.

आचार्य धर्मदेव विद्या मार्तण्ड

The right path for scholars is indicated.

अन्वय:

O scholar ! you don't support those who are enemy of the learned and common men. You make us to get over the enemies who are haters to them.

भावार्थभाषाः - Those who side with and make company with religious learned and common men, they are never let down.

माता सविता जोशी

(यह अनुवाद स्वामी दयानन्द सरस्वती जी के आधार पर किया गया है।)
भावार्थभाषाः - जे द्वेष सोडून धार्मिक विद्वानांवर व अविद्वानांवर प्रेम करतात, ते कुणाकडून तिरस्कृत होत नाहीत. ॥ २ ॥