इ॒मां मे॑ अग्ने स॒मिध॑मि॒मामु॑प॒सदं॑ वनेः। इ॒मा ऊ॒ षु श्रु॑धी॒ गिरः॑॥
imām me agne samidham imām upasadaṁ vaneḥ | imā u ṣu śrudhī giraḥ ||
इ॒माम्। मे॒। अ॒ग्ने॒। स॒म्ऽइध॑म्। इ॒माम्। उ॒प॒ऽसद॑म्। व॒ने॒रिति॑ वनेः। इ॒माः। ऊँ॒ इति॑। सु। श्रु॒धि॒। गिरः॑॥
स्वामी दयानन्द सरस्वती
अब आठ चावाले छठे सूक्त का आरम्भ है। उसके प्रथम मन्त्र में अग्नि के गुणों का वर्णन करते हैं।
हरिशरण सिद्धान्तालंकार
यज्ञ-उपासना-ज्ञान
स्वामी दयानन्द सरस्वती
अथाग्निगुणानाह।
हे अग्नेऽध्यापक यथाऽग्निर्मे ममेमां समिधमिमामुपसदं च सेवते तथा त्वं वनेरिमा उ गिरः सु श्रुधि ॥१॥
डॉ. तुलसी राम
आचार्य धर्मदेव विद्या मार्तण्ड
The attributes of Agni are stated.
O fire-like scholar (Agni) ! the way you accept the oblations put in the holy pit of the Homa, likewise you listen to the lessons and practical actions of your pupils.
माता सविता जोशी
(यह अनुवाद स्वामी दयानन्द सरस्वती जी के आधार पर किया गया है।)या सूक्तात वह्नी व ईश्वराच्या गुणांचे वर्णन असल्यामुळे या सूक्ताच्या अर्थाची मागच्या सूक्ताच्या अर्थाबरोबर संगती आहे, हे जाणले पाहिजे.
