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गोम॑दू॒ षु ना॑स॒त्याऽश्वा॑वद्यातमश्विना। व॒र्ती रु॑द्रा नृ॒पाय्य॑म्॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

gomad ū ṣu nāsatyāśvāvad yātam aśvinā | vartī rudrā nṛpāyyam ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

गोऽम॑त्। ऊँ॒ इति॑। सु। ना॒स॒त्या॒। अश्व॑ऽवत्। या॒त॒म्। अ॒श्वि॒ना॒। व॒र्तिः। रु॒द्रा॒। नृ॒ऽपाय्य॑म्॥

ऋग्वेद » मण्डल:2» सूक्त:41» मन्त्र:7 | अष्टक:2» अध्याय:8» वर्ग:8» मन्त्र:2 | मण्डल:2» अनुवाक:4» मन्त्र:7


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स्वामी दयानन्द सरस्वती

अब अग्नि और वायु के गुणों को कहते हैं।

पदार्थान्वयभाषाः - हे मनुष्यो ! जैसे (नासत्या) असत्यरहित (रुद्रा) दुष्ट के रुलानेवाले (अश्विना) व्यापनशील अध्यापकोपदेशक (अश्वावत्) घोड़े के तुल्य (उ) वा (गोमत्) बहुत गायें जिसमें विद्यमान उस (नृपाय्यम्) मनुष्यों के माननेवाले (वर्त्तिः) मार्ग को (सुयातम्) अच्छे प्रकार प्राप्त होते हैं, वैसे तुम इनको प्राप्त होओ ॥७॥
भावार्थभाषाः - मनुष्य यदि वायु और अग्नि के यान से यहाँ-वहाँ जावें, तो परिमित सुख पावें ॥७॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

गोमत्+अश्वावत्

पदार्थान्वयभाषाः - १. हे (नासत्या) = असत्य से रहित-सब प्रकार के असत्य को हमारे से दूर करनेवाले अथवा नासाछिन्द्रों में चलनेवाले- (अश्विना) = प्राणापानो! (रुद्रा) = [रुत्+द्रावयतः] आप रोगों को दूर करनेवाले हो । प्राणायाम से सब दोषों का दहन होकर नीरोगता प्राप्त होती है। आप (उ) = निश्चय से (सु) = अच्छी प्रकार (वर्तिः) = [abode residence] शरीरगृह को (यातम्) = प्राप्त कराओ। २. उस शरीरगृह को जो कि (क) गोमत् = प्रशस्त ज्ञानेन्द्रियोंवाला है (गाव: - ज्ञानेन्द्रियां) (ख) अश्वावत्-उत्तम कर्मेन्द्रियोंवाला है, तथा (ग) नृपाय्यम्- उन्नतिपथ पर चलनेवालों से रक्षणीय है ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- प्राणसाधना होने पर शरीर उत्तम ज्ञानेन्द्रियों व कर्मेन्द्रियोंवाला होता है— इसके द्वारा-हम उन्नतिपथ पर आगे बढ़ते हैं ।
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स्वामी दयानन्द सरस्वती

अथाग्निवायुगुणानाह।

अन्वय:

हे मनुष्या यथा नासत्या रुद्राश्विना अश्वावद्गोमदू नृपाय्यं वर्त्तिः सुयातं प्राप्नुतस्तथा यूयमेतौ प्राप्नुत ॥७॥

पदार्थान्वयभाषाः - (गोमत्) बह्व्यो गावो विद्यते यस्मिँस्तत् (उ) वितर्के (सु) शोभने (नासत्या) असत्यरहितौ (अश्वावत्) अश्वेन तुल्यौ (यातम्) प्राप्नुतः (अश्विना) व्यापनशीलौ (वर्त्तिः) मार्गम् (रुद्रा) दुष्टानां रोदयितारौ (नृपाय्यम्) नृणां पाय्यं मानं नृपाय्यम् ॥७॥
भावार्थभाषाः - मनुष्या यदि वाय्वग्नियानेन यत्र-तत्र गच्छेयुस्तर्हि परिमितं सुखमाप्नुयुः ॥७॥
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - Ashvins, complementarities of nature and humanity, spirits of love and justice, dedicated to truth and Dharma, rich and prosperous with cows and horses, that is, plenty of wealth and enlightenment and speed of progress, you are Rudras, wielding the sceptre of law and power and the rod of punishment, come to bless all by simple and straight paths of naturalness which are protective and promotive for all people.
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आचार्य धर्मदेव विद्या मार्तण्ड

The attributes of the fire and air are told.

अन्वय:

O men ! as pervasive fire and air which are devoid of untruthful character and cause wicked people to weep, they go to the path where there are many horses and cows. That path is protected by good men. You should also do the same way.

भावार्थभाषाः - If men go to distant places with the vehicles or conveyances made with the proper combination of fire water and air etc., they can enjoy limited happiness.
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माता सविता जोशी

(यह अनुवाद स्वामी दयानन्द सरस्वती जी के आधार पर किया गया है।)
भावार्थभाषाः - भावार्थ -माणसे जर वायू व अग्नीयुक्त यानाने जेथे जेथे जातील तेथे तेथे खूप सुख प्राप्त करतील. ॥ ७ ॥